वर्षों से चली आ रही इन्डस जल संधि (Indus Waters Treaty) को दुबारा जांच के बीच एक नया जल तंटा उत्पन्न हो गया है। दोनों देशों के बीच जल के बरामदे को लेकर फिर से तनाव बढ़ा है, जब पाकिस्तान ने भारतीय जल नीति को लेकर कई दावे पेश किए हैं, जिन्हें भारत ने खुले आम बहाना बताया है। भारत‑पाकिस्तान के बीच 1960 में हस्ताक्षरित इस 66 वर्षीय संधि से भारत को इन्डस नदी के कई प्रमुख उपनदियों पर नियंत्रण मिला है, जबकि पाकिस्तान को रावी, सतलुज और बुजेराह जैसे बहुतेरे जल स्रोतों का उपयोग अधिकार मिला है। अब पाकिस्तान के कुछ राजनैतिक चेहरे भारत की तरफ से इन अधिकारों को कम करने की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर दो पक्षों की छवि बिगड़ रही है। पाकिस्तान ने हाल ही में अपने कुछ अधिकारीयों को यह बयान देते हुए कहा कि भारत इन्डस जल संधि को समझौता कर रहा है और इस पर पुनर्विचार कर रहा है, जिससे पाकिस्तान को अपनी जल सुरक्षा को लेकर डर है। इस बात को लेकर भारत ने तुरंत खंडन किया कि संधि के अनुच्छेदों में किसी भी प्रकार का संशोधन नहीं किया गया है और भारत ने हमेशा संधि के मूल सिद्धांतों का पालन किया है। भारत‑पाकिस्तान के बीच जल अधिकारों को लेकर खींचतान सबसे पहले 2019 में जहाज़ों के जल निकासी को लेकर उठी थी, परन्तु अब इस मुद्दे को रणनीतिक रूप से उपयोग कर पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मदद माँगी है। इस जल विवाद में प्रमुख कारक है इन्डस नदी का बहाव और जलआदि का विभाजन, जो दोनों देशों के बीच जल सुरक्षा, कृषि और उद्योग के लिए अत्यंत महत्व रखता है। जब पाकिस्तान ने पूर्वी जल स्रोतों के अधिकारों को चुनौती देना शुरू किया, तो भारतीय मीडिया ने इसे "विकल्पी जल युद्ध" की तरह प्रस्तुत किया, जबकि पाकिस्तान ने अपने दावों को "पाकिस्तान के जल भविष्य की रक्षा" के रूप में बताया। कई विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बयान केवल राजनीतिक खेल के हिस्से हैं, जिससे वास्तविक जल संकट को नजरअंदाज किया जा रहा है। अंत में यह कहा जा सकता है कि इन्डस जल संधि का मूल उद्देश्य दोनों देशों के बीच जल के निष्पक्ष वितरण को सुनिश्चित करना था, परन्तु वर्तमान में यह एक नई राजनीतिक अड़चन बनकर उभरी है। भारत ने स्पष्ट रूप से अपने संधि के सिद्धांतों को बरकरार रखने की घोषणा की है, जबकि पाकिस्तान के दावे अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस संधि को कुप्रचार करने का एक माध्यम बन गए हैं। इस प्रकार, जल संसाधनों की इस बारीकी से बनी गठजोड़ को अगर सम्मान नहीं दिया गया तो भविष्य में दोनों देशों के बीच जल की "युद्धोत्तर" स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसका समाधान केवल पारस्परिक समझौते और संधि के नियमों का कड़ाई से पालन ही कर सकता है।