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Breaking News: सीजेआई का जलते सवाल: बेरोजगार युवाओं को ‘कोकरोच’‑भेड़िये करार, समाज‑माध्यमों में बसते अपराधी
🕒 1 hour ago

वर्तमान में भारत के न्यायिक प्रणाली के प्रमुख व्यक्ति, मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने एक सत्र में बेरोजगार युवाओं के आह्वान को लेकर तीखी टिप्पणी की। उनका कहना था कि आजकल युवा वर्ग रोजगार की असुरक्षा, आर्थिक दबाव और सामाजिक निराशा के कारण सामाजिक मीडिया, आरटीआई और सक्रियता के बहाने सत्ता के खिलाफ़ अति‑आक्रमक आंदोलन कर रहे हैं। इस टिप्पणी को सुनते ही कई संगठनों ने ‘कोकरोच’ शब्द का उपयोग करने के लिए न्यायपालिका की आलोचना की, जबकि न्यायाधीश ने इसे वहन करने वाले वर्ग की अछूत स्थिति की ओर इशारा किया। सीजेआई ने यह आरोप लगाते हुए कहा कि कई बेरोजगार युवा, बिना किसी ठोस योजना के, सार्वजनिक मंचों पर आहत करने वाले अभियानों को शुरू कर देते हैं और हर किसी को निशाना बना लेते हैं—सिर्फ सरकारी नीतियों को ही नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेशों, सामाजिक संस्थाओं और व्यक्तिगत नागरिकों को भी। उनका मानना था कि यह अति‑सक्रियता अक्सर अस्थायी रोजगार से जुड़ी हुई खाई को पाटने के लिए नहीं, बल्कि अपने वैध अधिकारों की भरपूर मांग के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक दांव‑पेंच में अपना रास्ता बनाने के लिए की जाती है। इस क्रम में वे विशेषकर उन युवा वर्ग को ‘कोकरोच‑भेड़िये’ जैसे अपमानजनक शब्दों से पुकारते हैं, जो बेरोजगारी के कारण सामाजिक मंच पर उभरे हुए हैं। यह टिप्पणी कई पहलुओं में चर्चा का स्रोत बनी। पहले, यह प्रश्न उठता है कि क्या न्यायपालिका को सामाजिक मुद्दों की सार्वजनिक व्याख्या करने का अधिकार है या यह उनके दायरे से बाहर है। दूसरी ओर, कई युवा और सामाजिक कार्यकर्ता इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए कि उन्हें ‘कोकरोच’ की तरह दर्शाया जाए, जबकि वास्तव में उनके सामने आर्थिक असमानता और नौकरी के अवसरों की कमी जैसी गंभीर समस्याएँ खड़ी हैं। कई विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह की भाषा से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और सरकारी नीतियों में सुधार के लिए संवाद का मार्ग बंद हो सकता है। अंत में, इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय न्यायपालिका भी सामाजिक बदलाव की गति को लेकर चिंतित है। हालाँकि, न्यायालय के हाई टेंशन में रहे इस स्वरूप को देखते हुए, यह आवश्यक है कि नीतिनिर्धारक और सामाजिक प्रतिनिधि मिलकर बेरोजगार युवाओं को वास्तविक रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करने के लिए ठोस कदम उठाएँ। तभी यह संभावना बनेगी कि ‘कोकरोच‑भेड़िये’ जैसे आक्रमक शब्दों की आवश्यकता न पड़े और समाज में स्थायी शांति और विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके।

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✍️ By Pradeep Yadav | 15 May 2026