सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख न्यायाधीश ने हाल ही में एक सत्र में बताया कि आजकल कई बेरोजगार युवा जॉकरों की तरह ही सोशल मीडिया के मंच पर घुसपैठ कर, आरटीआई (सूचना का अधिकार) एक्ट के नाम पर छोटे‑छोटे मामले दायर कर अपने आप को सामाजिक कार्यकर्ता घोषित कर रहे हैं। यह बयान कोर्ट के एक सुनवाई के दौरान दिया गया, जहाँ न्यायाधीश ने इस प्रवृति को ‘जॉकरों जैसा’ कहा, क्योंकि ये युवा लगातार घिरन‑घिरन जानकारी मांगते और फिर भी ठोस समाधान नहीं लाते। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कई ऐसे वकील हैं जो झूठी डिग्री दिखाकर न्यायालय में पेश होते हैं, जिससे अदालत की गरिमा पर आँधियों की तरह असर पड़ रहा है। इन विचारों के पीछे मुख्य कारणों को न्यायाधीश ने विस्तार से बताया। सबसे पहले, युवा वर्ग की निराशा और रोजगार की कमी ने उन्हें त्वरित पहचान और सम्मान के लिये सोशल मीडिया और सूचना अधिकार के मंच की ओर धकेल दिया है। दूसरे, इस दौर में प्लेटफ़ॉर्म की अनियंत्रित प्रकृति ने उन्हें बिना किसी जिम्मेदारी के अराजकता फैलाने का अवसर दिया। तीसरे, झूठी डिग्री वाले वकीलों की समस्या को लेकर उन्होंने कहा कि यह न केवल न्यायिक प्रणाली को कमजोर करता है, बल्कि सामान्य नागरिकों के भरोसे को भी क्षति पहुँचाता है। न्यायाधीश ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए कुछ ठोस उपायों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राजनैतिक और प्रशासनिक स्तर पर युवाओं को कौशल विकास एवं रोजगार सृजन के लिये विशेष योजनाएँ लागू की जानी चाहिए, जिससे वे बेतरतीब मुकदमेबाजी की ओर न झुकें। साथ ही, मीडिया की भूमिका को जिम्मेदार बनाना आवश्यक है; सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को झूठी जानकारी और अभिप्रेत दुरुपयोग के खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए। अंत में, वकीलों की योग्यता की जाँच को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए, ताकि झूठी डिग्री वाले लोग अदालत में प्रवेश न कर सकें। इन बयानों पर विभिन्न पक्षों से अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ मिली हैं। कई सामाजिक विश्लेषकों ने यह माना कि न्यायाधीश ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे को उजागर किया है, जबकि कुछ ने उनके शब्दों को ‘अत्यधिक कठोर’ कहा। वहीं, युवाओं की आवाज़ उठाने वाले समूह ने कहा कि रोजगार की कमी और सामाजिक असमानता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इस बीच, न्यायपालिका को अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिये इस प्रकार की टिप्पणी को सकारात्मक दिशा में बदलना आवश्यक है। समग्र रूप में, प्रधान न्यायाधीश के इस टिप्पणी ने समाज में चल रही कई समस्याओं को उजागर कर दिया है। युवा वर्ग की निराशा, सोशल मीडिया का दुरुपयोग, और झूठी डिग्री वाले वकीलों की बढ़ोतरी एक साथ मिलकर न्यायिक प्रणाली की स्थिरता को चुनौती दे रहे हैं। इन चुनौतियों को मिलकर हल करने के लिये सरकार, न्यायपालिका, शिक्षा संस्थानों और मीडिया को एकजुट होकर ठोस उपाय अपनाने होंगे, ताकि भविष्य में इस प्रकार के ‘जॉकरों’ को समाज में स्थान न मिले और न्याय का पथ वाकई में साफ़ और भरोसेमंद बन सके।