राजस्थान के वन्यजीव संरक्षण हलकों में चिंता की एक बड़ी लहर दौड़ गई है जब वर्ष 2026 की गणना के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य में भेड़ियों के अस्तित्व पर एक गंभीर और आसन्न संकट मंडरा रहा है, जिससे संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता पर सवाल खड़े हो गए हैं। व्यापक सर्वेक्षण रिपोर्ट पुष्टि करती है कि पूरे प्रदेश में अब केवल 467 भेड़िए ही शेष बचे हैं, जो इन वन्यजीवों की घटती संख्या को दर्शाती है।
ऐतिहासिक रूप से राजस्थान के विस्तृत शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र देशी वन्यजीव प्रजातियों को स्वतंत्र रूप से विचरने, प्रजनन करने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए उपयुक्त प्राकृतिक गलियारे प्रदान करते आए हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में तीव्र गति से बढ़ते औद्योगिकीकरण, आक्रामक खनन गतिविधियों, कृषि योग्य भूमि के विस्तार और सड़कों के व्यापक जाल ने इस प्राकृतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है। इन संरचनात्मक परिवर्तनों ने भेड़ियों के पारंपरिक आवासों को खंडित कर दिया है, जिससे उनकी आवाजाही के रास्ते बाधित हुए हैं।
वर्ष 2026 की गणना के सूक्ष्म विश्लेषण से एक बेहद चिंताजनक भौगोलिक वितरण सामने आया है, जिसके अनुसार दर्ज कुल 467 भेड़ियों में से 396 यानी लगभग 85 प्रतिशत वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों और अभ्यारण्यों की सीमा से बाहर पाए गए हैं। औपचारिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों के भीतर शेरगढ़ सेंचुरी में सबसे अधिक 39 भेड़िए दर्ज किए गए। इसके विपरीत, संरक्षित सीमाओं के बाहर झुंझुनूं जिला 74 भेड़ियों के साथ पहले स्थान पर रहा, जो यह साबित करता है कि बहुसंख्यक आबादी इंसानी बस्तियों के करीब रहने को मजबूर है।
संरक्षित क्षेत्रों के बाहर इतनी बड़ी संख्या में भेड़ियों का निवास करना इन वन्यजीवों को सीधे तौर पर मानवीय बस्तियों, मवेशी चराने वाले क्षेत्रों और वाणिज्यिक गतिविधियों के संपर्क में लाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का मानना है कि इस प्रकार के अतिव्यापन से अक्सर स्थानीय ग्रामीण समुदायों और मांसाहारी वन्यजीवों के बीच तनाव पैदा होता है। जब तक इन दूरदराज के क्षेत्रों में पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपाय और वन्यजीव गलियारे विकसित नहीं किए जाते, तब तक इन शेष बचे झुंडों का जीवन खतरे में रहेगा।
क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो कोटपूतli-बहरोड़ और आसपास के जिलों जैसे क्षेत्रों में तीव्र औद्योगिक एवं कृषि विकास के कारण स्थानीय जीव-जंतुओं पर भारी दबाव पड़ रहा है। कृषि भूमि के लगातार बढ़ते दायरे और सड़कों के विस्तार ने वन्यजीवों को बेहद संकुचित क्षेत्रों में सिमटने के लिए मजबूर कर दिया है। स्थानीय ग्रामीण समुदायों को अक्सर इन विस्थापित वन्यजीवों के साथ अपनी साझी संपत्तियों को साझा करना पड़ता है, जिसके लिए सुनियोजित प्रबंधन रणनीतियों की आवश्यकता है ताकि किसी भी तरह के संघर्ष को टाला जा सके।
इस गंभीर पारिस्थितिक संकट की गहराई को देखते हुए जाने-माने पर्यावरणविद् बाबूलाल जाजू ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। भेड़ियों की इस दयनीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए जाजू ने राज्य सरकार और वन विभाग के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि गोडावण पक्षी की तर्ज पर भेड़ियों के संरक्षण के लिए भी एक विशेष कार्ययोजना तैयार की जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि इन वन्यजीवों के संरक्षण हेतु एक समर्पित कार्ययोजना और मजबूत कानूनी सुरक्षा का होना निहायत जरूरी है।
भविष्य की रूपरेखा को लेकर वन्यजीव प्रेमियों और सामाजिक संगठनों की निगाहें अब प्रशासनिक तंत्र पर टिकी हैं कि वे 2026 की जनगणना के इन आंकड़ों का संज्ञान लें। आगे का रास्ता यही मांग करता है कि आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे के विस्तार और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक संतुलित तालमेल बिठाया जाए। यदि समय रहते इन 467 बचे हुए भेड़ियों, विशेषकर संरक्षित क्षेत्रों से बाहर रह रहे 85 प्रतिशत वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो राजस्थान अपनी समृद्ध प्राकृतिक विरासत के एक महत्वपूर्ण हिस्से को खो सकता है।