21 सितंबर को घड़साना गाँव में एक बड़े पैमाने पर प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा, जहाँ खाजूवाला क्षेत्र के किसान संगठनों ने 58 प्रतिशत सिंचाई जल के आवंटन की माँग रखी है। यह प्रदर्शन, जिसे आयोजकों ने "शक्ति प्रदर्शन" कहा है, अगस्त के शुरुआती हफ़्तों से चल रहे गाँव‑दर‑गाँव संपर्क अभियान के बाद तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य उत्तर राजस्थान के कृषि क्षेत्र में समर्थन को एकत्रित करना है।
खाजूवाला में जल विवाद की जड़ें 2000 के दशक की शुरुआत तक पहुँचती हैं, जब इंदिरा गांधी नहर के निर्माण ने पारंपरिक जल प्रवाह को बदल दिया और कई सीमांत खेतों को मौसमी जल वितरण पर निर्भर बना दिया। पिछले दशक में बार‑बार जल की कमी के कारण कई बार विरोध हुए, परन्तु अब तक कोई समूह स्पष्ट प्रतिशत माँग नहीं कर पाया था। 58 प्रतिशत की वर्तमान माँग किसान समूहों के द्वारा की गई गणना पर आधारित है, जो इस हिस्से को प्राप्त करने से गेहूँ, सरसों और कपास की मुख्य फसल चक्रों को सुरक्षित किया जा सकेगा, जो इस क्षेत्र की प्रमुख कृषि उपज हैं।
जमीनी स्तर पर यह माँग आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है। किसानों का अनुमान है कि जल आपूर्ति में केवल 10 प्रतिशत की कमी भी गेहूँ की पैदावार को 15 प्रतिशत तक घटा सकती है, जिससे प्रत्येक परिवार को कई लाख रुपये का नुकसान हो सकता है। खाजूवाला ब्लॉक की सिंचाई नेटवर्क में कई वितरण नहरें शामिल हैं, जो जिला जल प्राधिकरण के अनुसार शिखर मौसम में अपनी नियोजित क्षमता के लगभग 40 प्रतिशत पर कार्य कर रही हैं। 58 प्रतिशत की माँग इस मौजूदा प्रवाह में लगभग आधी वृद्धि का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि इसके लिए अतिरिक्त पंप‑संचालन योजनाओं को सक्रिय करना पड़ेगा।
हितधारकों के दृष्टिकोण इस मुद्दे की तात्कालिकता पर सहमत हैं, पर समाधान के तरीकों में अंतर है। किसान नेताओं का कहना है कि जल की कमी से खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ रही है और लगभग 30,000 परिवारों की आजीविका प्रभावित हो रही है। राज्य जल विभाग ने कहा है कि जलाशयों के स्तर में कमी और नीचे की ओर स्थित शहरी क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धी माँगें इस समस्या को जटिल बनाती हैं। सतत कृषि पर कार्य करने वाले गैर‑सरकारी संगठनों ने मध्यस्थता के लिए संवाद की अपील की है, यह चेतावनी देते हुए कि यदि स्थिति बिगड़ती रही तो मिट्टी की लवणता बढ़ेगी और मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र और अधिक क्षतिग्रस्त होगा।
इस प्रदर्शन का प्रभाव केवल किसान समुदाय तक सीमित नहीं है; यह कोटपूतली‑बेहरोर जिले की समग्र अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगा। खाजूवाला की कृषि उत्पादन कोटपूतली के बाजारों को आपूर्ति करती है, जहाँ थोक व्यापारियों को गेहूँ और सरसों की निरंतर आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता है। फसल में बाधा उत्पन्न होने से कीमतों में अस्थिरता आ सकती है, जिससे शहरी उपभोक्ता और ग्रामीण विक्रेता दोनों ही प्रभावित होंगे। साथ ही, परिवहन, कृषि‑रसायन विक्रेता और ग्रामीण ऋण संस्थान जैसी सहायक सेवाएँ भी यदि प्रदर्शन के कारण सामान्य कार्य नहीं कर पाए तो राजस्व में कमी का सामना कर सकती हैं।
प्रतिक्रिया स्वरूप, जिला प्रशासन ने एक बयान जारी किया है जिसमें कहा गया है कि वह “किसानों की वैध माँगों को संबोधित करने के साथ साथ जल संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करने” के लिए प्रतिबद्ध है। कोटपूतली‑बेहरोर के कलेक्टर ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने की घोषणा की है, जिसमें अभियंता, कृषि विशेषज्ञ और किसान प्रतिनिधि शामिल होंगे, और कहा गया है कि अगले दो हफ़्तों के भीतर नहरों के प्रवाह डेटा की समीक्षा कर पुनः आवंटन योजना प्रस्तुत की जाएगी। साथ ही, जल विभाग ने नहरों के रख‑रखाव कार्य को तेज करने और प्रवाह की निगरानी को बढ़ाने का वादा किया है।
आगे की राह में, घड़साना प्रदर्शन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि समिति की सिफ़ारिशें कितनी शीघ्र और पारदर्शी रूप से लागू की जाती हैं। किसानों ने कहा है कि वे 28 सितंबर को सरकार की प्रतिक्रिया का मूल्यांकन करने के लिए पुनः मिलेंगे, और यदि 58 प्रतिशत लक्ष्य नहीं पूरा हुआ तो वे पड़ोसी ब्लॉकों में प्रदर्शन का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आंदोलन का परिणाम राजस्थान में जल‑अधिकार वार्ताओं के लिए एक मिसाल स्थापित कर सकता है, जिससे शुष्क क्षेत्रों में अधिक लचीले सिंचाई प्रबंधन के लिये नीति सुधारों को गति मिल सकती है।