अभियंता दिवस के पावन अवसर पर बाड़मेर की मरुधरा एक अभूतपूर्व औद्योगिक और सामाजिक परिवर्तन की साक्षी बन रही है। कभी भीषण जल संकट और बेटियों की शिक्षा तथा स्वतंत्रता को लेकर रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं के लिए कुख्यात रहा यह जिला अब ऊर्जा उत्पादन और महिला सशक्तिकरण की एक नई और स्वर्णिम कहानी लिख रहा है। इस औद्योगिक क्रांति के केंद्र में वे 130 से अधिक महिला इंजीनियर हैं, जो पारंपरिक सामाजिक सीमाओं को लांघकर और भौगोलिक चुनौतियों को मात देकर देश की ऊर्जा सुरक्षा में अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं।
ऐतिहासिक रूप से थार का यह मरुस्थल किसी भी प्रकार की विकासात्मक पहल और विशेषकर भारी औद्योगिक गतिविधियों के लिए अत्यंत दुष्कर क्षेत्र रहा है। दशकों तक बाड़मेर बुनियादी ढांचे की कमी, जल संसाधनों के अभाव और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं से जूझता रहा, जिसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं और बालिकाओं के विकास पर पड़ा। हालांकि, इस क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन के प्रचुर भंडारों की खोज ने इसकी आर्थिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया और इसे देश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्रों में स्थापित कर दिया।
जिले के मंगला, भाग्यम और रागेश्वरी समेत प्रमुख ऑयल फील्ड्स में तैनात ये महिला इंजीनियर अत्यंत कठिन और तकनीकी रूप से जटिल दायित्वों का निर्वहन कर रही हैं। ग्रीष्मकाल में 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने वाले भीषण तापमान और तपती रेत के बीच ये बेटियां पेट्रोकेमिकल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, प्रोडक्शन, ड्रिलिंग और प्लांट मेंटेनेंस जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी सेवाएं दे रही हैं। 130 से अधिक महिला इंजीनियरों की यह उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि पेट्रोलियम क्षेत्र में लैंगिक पूर्वाग्रह तेजी से समाप्त हो रहे हैं।
सुरभि पुरोहित, रिच सिन्हा और सुरुचि शर्मा जैसी प्रतिभाशाली इंजीनियर तकनीकी मोर्चे पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं। ये सभी पेशेवर अपने पुरुष सहयोगियों के समान ही दायित्व संभालते हुए जटिल संयंत्रों का संचालन, ड्रिलिंग प्रक्रियाओं की निगरानी और प्लांट के सुचारू रखरखाव का कार्य पूरी दक्षता के साथ कर रही हैं। उनकी यह कार्यकुशलता और प्रतिकूल मौसम में अडिग रहने की क्षमता इस बात को सिद्ध करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बड़ी से बड़ी बाधाएं भी छोटी पड़ जाती हैं।
बाड़मेर के इन तेल क्षेत्रों में महिलाओं की यह भागीदारी केवल औद्योगिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे पश्चिमी राजस्थान के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ रहा है। इन महिला इंजीनियरों की सफलता ने समाज की उस संकीर्ण सोच को चुनौती दी है जो बेटियों को तकनीकी शिक्षा और क्षेत्रों से दूर रखती थी। आज इन बेटियों को देखकर ग्रामीण अंचल के परिवारों की सोच में सकारात्मक बदलाव आया है, जिससे आने वाली पीढ़ियों की बालिकाओं को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आगे बढ़ने का संबल मिल रहा है.
प्रशासनिक स्तर पर भी इन महिला कर्मचारियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर उनकी सुविधाओं को लेकर विशेष प्रबंध किए गए हैं। 48 डिग्री की भीषण गर्मी में कार्य करने वाली इन इंजीनियरों के लिए संयंत्रों में आधुनिक सुरक्षा मानक, वातानुकूलित कार्यस्थल और निरंतर तकनीकी प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। औद्योगिक प्रबंधनों द्वारा उठाए गए इन कदमों से न केवल कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा पुख्ता होती है, बल्कि संपूर्ण उत्पादन प्रक्रिया की दक्षता में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है।
भविष्य की ओर देखते हुए, बाड़मेर के तेल क्षेत्रों में महिलाओं का यह नेतृत्व देश के अन्य भारी उद्योगों के लिए एक अनुकरणीय मानक स्थापित करता है। मंगला, भाग्यम और रागेश्वरी ऑयल फील्ड्स में निरंतर जारी यह उत्पादन कार्य और इसमें सुरभि पुरोहित, रिचा सिन्हा तथा सुरुचि शर्मा जैसी इंजीनियरों का योगदान देश की आत्मनिर्भरता को और अधिक सुदृढ़ करेगा। बाड़मेर की तपती रेत से देश का काला सोना निकालती इन बेटियों की यह गाथा बदलते भारत के नए और सशक्त स्वरूप का जीवंत उदाहरण है।