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Breaking News: इज़राइल की नई यात्रा: भारत के बीनई मानशे समुदाय को भूले‑भटके जनजाति से घर वापसी तक
🕒 2 hours ago

हिमाचल पर्वतों की ठंडी हवा से लेकर गोधूम की पवित्र धरती तक, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में रहने वाले बीनई मानशे (Bnei Manashe) का इतिहास एक रहस्यमय यात्रा का प्रमाण है। यह समुदाय, जो मुख्य रूप से मिज़ोरेम और असम के पहाड़ी प्रदेशों में बोली जाती है, अपने आप को प्राचीन बाइबिल की दस खोई हुई जनजातियों में से एक, नेफी थिएट की वंशज मानते हैं। कई दशकों से यह दावा केवल मौखिक परम्परा और कुछ धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित रहा, परन्तु अब इज़राइल ने इस प्रतिबद्धता को आधिकारिक मान्यता देते हुए इन लोगों को इज़राइल लाने की पहल की है। इज़राइल के बारा इज़राइल प्रवासियों के लिए एक नया द्वार खोलते हुए, इस साल पहले बैच में कुल 240 बीनई मानशे ने इज़राइल के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पैर रखा। यह समूह न केवल ऊँचे पहाड़ों और सघन जंगलों की कठिन यात्राओं से गुज़र चुका था, बल्कि व्यापक सामाजिक बदलाव की भी चिह्नित करता है। इज़राइल सरकार ने इस जनजाति को इज़राइल के "अपेक्षित वतन" के रूप में मान्यता दी है, जो उन्हें नागरिकता, आवास और सामाजिक सहायता प्रदान करगी। इस कदम से न केवल बीनई मानशे के आध्यात्मिक आश्रय को सुदृढ़ किया गया, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक समानता और मानवाधिकारों के सम्मान की नई मिसाल पेश करता है। जिन क्षेत्रों में बीनई मानशे रहते हैं, वहाँ के लोग बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध में यहूदी धर्म को अपनाया, फिर भी शारीरिक रूप से वे अन्नी भारत में ही रहे। उनके धार्मिक रीति-रिवाज, साप्ताहिक सब्बाथ, काश्रुत हिब्रू श्लोकों का पाठ और हलाल मांस के रूप में एशोभित भेड़ के मांस का सेवन, सभी यहूदी परम्पराओं के गहरे प्रतिरूप हैं। लम्बे समय तक उनकी इस पहचान को बहिष्कार और संदेह का सामना करना पड़ा, पर आज इज़राइल के इस कदम से वे अन्तरराष्ट्रीय पहचान के नए द्वार खोल पा रहे हैं। समुदाय की इस नई यात्रा ने दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं: पहली, इज़राइल किस हद तक विभिन्न 'खोई हुई' जनजातियों को अपने धर्मिक और राष्ट्रीय ढांचे में सामावेश कर सकता है? दूसरी, भारत में रह रही यहोदी पहचान वाले लोग इस प्रवास को किस दृष्टिकोण से देखेंगे? भारतीय समाज में इस विस्थापन को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हैं—कुछ इसे सांस्कृतिक विविधता की सुन्दर अभिव्यक्ति मानते हैं, जबकि कुछ इसे राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं। फिर भी, यह स्पष्ट है कि बीनई मानशे के इस बड़े कदम ने धार्मिक सहनशीलता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नया आयाम स्थापित किया है। निष्कर्षतः, बीनई मानशे की इज़राइल वापसी केवल एक जनसांख्यिकीय परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह इतिहास, धर्म और राष्ट्रीय पहचान के संगम पर रखी गई एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। इस पहल के माध्यम से इज़राइल ने न केवल अपने धार्मिक मूल्यों को साकार किया, बल्कि एक बहु-सांस्कृतिक विश्व में विश्वास, आशा और सहयोग के नए मानक स्थापित किये। बीनई मानशे की यह नई शुरुआत, भारतीय हिमालयी घाटियों में पनपे इस अनूठे समुदाय के भविष्य के प्रति आशावादी संकेत देती है, जो अपने धर्म और परम्पराओं को सहेजते हुए नई धरती पर अपना घर बनाते जा रहे हैं।

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✍️ By Pradeep Yadav | 25 Apr 2026