भारत की राजनीति में सदी की सबसे बड़ी तमाशा तब शुरू हुई जब कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से भाजपा के दो‑तिहाई लोकसभा बहुमत के लक्ष्य को उजागर किया, और इसे आरक्षण समाप्त करने की सच्ची मंशा बताया। इस बयान से राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रश्न उठे हैं कि क्या भाजपा इस प्रकार के महान परिवर्तन को साकार करने के लिये अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिये गहन योजना बना रही है। कांग्रेस के प्रमुख प्रतिनिधियों ने कहा कि भाजपा केवल अपने विचारधारा में बदलाव नहीं बल्कि संविधान में बड़े‑बड़े संशोधन करके आरक्षण प्रणाली को समाप्त करने का इरादा रखती है, जिससे सामाजिक न्याय और समानता की मौजूदा संरचना में गहरा असर पड़ेगा। बाजपा के भीतर इस बात की पुष्टि करने वाले कई वरिष्ठ नेता भी सामने आए हैं। कुछ ने यह कहा कि दो‑तिहाई बहुमत से ही संविधान के अनुच्छेदों में बदलाव संभव हो पाएगा, जिसमें आरक्षण को हटाना शामिल है। इस प्रकार के बहुमत का लक्ष्य उठाने के पीछे मुख्य कारण यह बताया गया कि इससे पार्लियामेंट में वह शक्ति मिलेगी जिससे बड़े‑बड़े विधेयकों को बिना किसी विरोध के पारित किया जा सके। यह लक्ष्य मात्र संख्यात्मक शक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना गया है, जहाँ पार्टी अपने लिये प्रतिपादित नई व्यवस्था को लागू करने के लिये चुनावी जीत को मुख्य साधन मानती है। कांग्रेस ने इस संदर्भ में कहा कि अगर भाजपा इस योजना को साकार करती है तो सामाजिक पृष्ठभूमि में गहरी खाइयाँ फिर से उभरेँगी। आरक्षण प्रणाली, जो ऐतिहास्यक रूप से उपेक्षित और पिछड़े वर्गों को शिक्षा एवं नौकरियों में मौका देने के लिये बनाई गई थी, को हटाने से सामाजिक असमानता बढ़ सकती है। कई सामाजिक संगठनों ने इस बात पर चिंता जताते हुए कहा कि यह कदम सामाजिक सौहार्द को तोड़ सकता है और मौजुदा सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है। साथ ही, राजनीतिक वैज्ञानिकों ने भी इस बात पर प्रकाश डाला कि दो‑तिहाई बहुमत हासिल करने के लिये भाजपा को बड़े‑पैमाने पर गठबंधन और निर्वाचन क्षेत्रों में फिर से विभाजन की सम्भावना बनानी पड़ेगी, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। इन सब के बीच विपक्षी दलों और विभिन्न हित समूहों ने सावधानी बरतने की पुकार की है। उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े संविधानिक बदलाव के लिये व्यापक सामाजिक चर्चा, परामर्श और सहमतिपूर्ण प्रक्रिया होना अनिवार्य है। कांग्रेस ने भी अगले चुनाव में इस मुद्दे को अपनी प्रमुख मोर्चा बनाते हुए, जनता को इस संभावित योजना के दुष्परिणामों से बचाने की कसम खाई है। निष्कर्षतः, यदि भाजपा का दो‑तिहाई बहुमत लक्ष्य वास्तव में आरक्षण समाप्ति को अपना वास्तविक उद्देश्य बनाकर चल रहा है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए, यह जरूरी है कि सभी राजनीतिक दल, नागरिक समाज और जनसमुदाय मिलकर इस प्रश्न पर खुल कर चर्चा करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी बड़े बदलाव को सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों के साथ संतुलित रूप से लागू किया जाए।