राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान परिषद (NCERT) ने हाल ही में कक्षा 9 के नए कला पाठ्यपुस्तक में इंद्रप्रस्थ सभ्यता की प्रसिद्ध प्रतिमा – मोहनजो‑दड़ो की ‘डांसिंग गर्ल’ की छवि को धूसर कर दिया है। यह कदम कई शिक्षाविद्, इतिहासकार और सामाजिक समूहों में तीव्र बहस का कारण बन गया है। पुस्तक में मूल प्राचीन सिरेमिक चित्र की जगह एक धुंधली, ग्रे‑टोन वाली आकृति प्रस्तुत की गई है, जिससे युवा छात्रों को महिला प्रतिमा की स्पष्ट अभिव्यक्ति से बचाया जा सके, ऐसा NCERT का दावा है। इस बदलाव को सामाजिक‑सांस्कृतिक संवेदनशीलता के हवाले से लागू किया गया बताया गया, परन्तु आलोचकों का मानना है कि यह इतिहास के महत्वपूर्ण भाग को छुपा रहा है और राजनैतिक हस्तक्षेप का परिणाम है। पुस्तक की इस संशोधित छवि को लेकर कई समाचार माध्यमों ने विस्तृत रिपोर्ट जारी की। द हिंदु, द इंडियन एक्सप्रेस, टेलीग्राफ़ इंडिया और द प्रिंट आदि ने इस मुद्दे को सामाजिक‑राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में पेश किया। कई विशेषज्ञों ने कहा कि मोहनजो‑दड़ो की नृत्यांगना न केवल प्राचीन कला की एक महत्वपूर्ण कृति है बल्कि वैदिक काल से पूर्व की सभ्यता की सामाजिक-स्तर की झलक भी देती है। इसे धुंधला करना न केवल शैक्षिक सामग्री की गुणवत्ता को घटाता है, बल्कि विद्यार्थियों को इतिहास के विविध पहलुओं से परिचित कराने की संभावना को भी सीमित करता है। NCERT के पक्ष में बात करने वाले स्रोत यह स्पष्ट करते हैं कि नई छवि को पेश करने का मकसद छात्रों के मानसिक और भावनात्मक विकास को ध्यान में रखते हुए कोण-कोण पर हुए विवादों से बचना है। उनका तर्क है कि इस प्रकार की कलात्मक अभिव्यक्तियों को अत्यधिक सहजता से प्रस्तुत करने से कुछ वर्गों में असहजता उत्पन्न हो सकती है, जिससे शैक्षणिक माहौल पर असर पड़ सकता है। जबकि विरोधी दल कहता है कि शैक्षणिक सामग्री में आत्म-सेन्सरशिप की लहर चल रही है और यह राष्ट्रीय गर्व के विरुद्ध एक कदम है, क्योंकि मोहनजो‑दड़ो की नृत्यांगना को दुनिया भर में भारतीय प्राचीन कला की पहचान माना जाता है। विचारधारा के इस टकराव ने देश में एक विशाल सार्वजनिक विमर्श को जन्म दिया है। कई राजनीतिक नेता, सामाजिक संगठन और कलाकार इस परिवर्तन को "इतिहास को मिटाने" के रूप में पहचान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे "समकालीन शैक्षिक मूल्य" के अनुरूप मानते हैं। इस बहस के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या शैक्षणिक संस्थानों को सामाजिक दबाव के आधार पर पाठ्यक्रम में बदलाव करना चाहिए या फिर छात्रों को विविध इतिहासिक दृष्टिकोण प्रदान करना चाहिए। अंत में यह स्पष्ट है कि पाठ्यपुस्तक के इस छोटे परिवर्तन ने बड़े सवालों को उजागर किया है – इतिहास, कला और राष्ट्रीय पहचान के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए, और क्या शिक्षा को सामाजिक‑राजनीतिक दबावों से स्वतंत्र रहना चाहिए? यह प्रश्न अब छात्रों, शिक्षकों और नीति निर्माताओं के बीच लगातार चर्चा का विषय बनता रहेगा।