नई दिल्ली: हाल ही में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा भारत पर कई बयानों ने देश के शीर्ष राजनेताओं के बीच तीव्र चर्चा को जन्म दिया है। इस संदर्भ में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "आज्ञाकारी नौकर" का शब्द प्रयोग करते हुए कड़ी आलोचना की। यह बयान राहुल गांधी द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में आया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत को "भर्ती के आदेशों का पालन" करने वाला एक नौकर नहीं होना चाहिए, बल्कि स्वतंत्र रूप से अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाला एक सुदृढ़ लोकतांत्रिक शासन रहना चाहिए। उनके इस बयान का उद्देश्य अमेरिकी बयानबाजी के खिलाफ भारत की स्वायत्तता को रेखांकित करना था, जो हाल ही में इरान से तेल की अदालती प्रतिबंधों और हिंदुस्तानी नौसैनिक बलों की सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं पर केंद्रित था। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि भारत को किसी भी बाहरी ताकत की नीतियों के अधीन नहीं होना चाहिए, चाहे वह आर्थिक हो या सैनिक। उन्होंने कहा, "अमेरिका ने हमारी समुद्री सुरक्षा को लेकर कई बयानों से भारत को निपटता हुआ दिखाया, परंतु यह भारत के लिये अनुचित है कि वह केवल आदेशों का पालन करने वाला नौकर बनकर रह जाए।" इस पर विपक्षी दलों ने भी समर्थन जताते हुए कहा कि विदेश नीति में स्वायत्तता बनाए रखना आवश्यक है, जबकि कुछ पक्षकारों ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह के बयानों से राष्ट्रीय एकता पर दाग लगा सकता है। इस बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि वह इरान से भारत द्वारा हो रहे गैरकानूनी तेल आयात को रोकने के लिए सभी संभव कदम उठाएगा। भारत सरकार ने इस बात को स्वीकार किया और कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और प्रतिबंधों का पालन करेगा, लेकिन साथ ही अपने ऊर्जा सुरक्षा के लिये वैकल्पिक विकल्पों की खोज भी जारी रखेगा। इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि मानते हुए सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सम्मान करेगा और अनावश्यक विवादों से बचने के लिये सभी कारगर कदम उठाएगा। इन बहसों के बीच भारतीय नौसेना के सातों में से पाँच सौ से अधिक सैनिकों को स्ट्रेट ऑफ़ हॉरमज़ में 107 दिनों तक फँसने की खबर भी सामने आई। यह घटना अमेरिका की ओर से भारत के नौसैनिक बलों के साथ हुई टकराव को लेकर उठाए गए प्रश्नों को और जटिल बनाती है। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत की समुद्री सुरक्षा को कोई भी अस्थायी या स्थायी चुनौती नहीं गिरा सकती और सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। अंत में, इस विवादित माहौल में राष्ट्रीय संवाद को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा गया कि विदेश नीति के निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत ही होने चाहिए, और किसी भी बाहरी दबाव को सहन नहीं किया जा सकता।