नई दिल्ली: पिछले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नॉर्वेजियन पत्रकार हेल्ले लिंग द्वारा पूछे गए सवाल को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया, जिससे देश-विदेश में मीडिया की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर तीखी बहस छिड़ गई। यह घटना विदेश यात्रा के दौरान हुई, जब पत्रकार ने प्रधानमंत्री से भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और विदेश नीति संबंधी प्रश्न पूछने का साहस किया। मोदी ने प्रश्न को न मानते हुए कहा कि ऐसी पूछताछ से राजनयिक शिष्टाचार का उल्लंघन होगा और आगे इस प्रकार के प्रश्नों के लिये मंच नहीं रहेगा। यह व्यवहार विभिन्न समुदायों और राजनीतिक दलों में गहरी चिंता उत्पन्न कर रहा है, क्योंकि लोकतांत्रिक समाज में सरकार को नागरिकों और मीडिया के सवालों का उत्तर देना अनिवार्य माना जाता है। इस निर्णय पर विपक्षी दलों ने तीखा एहतियात जताया और इसे लोकतांत्रिक परम्परा के विरुद्ध मानते हुए कांग्रेस के प्रमुख सांसद ने कहा कि मोदी ने लोकतंत्र की बुनियादी परम्परा को तोड़ दिया है, जहाँ प्रधानमंत्री को हमेशा पूछे जाने वाले सवालों का जवाब देना पड़ता है। कई स्वतंत्र मीडिया संगठनों ने भी इस घटना को "सवाल पूछने का अधिकार" के उल्लंघन के रूप में दर्ज किया और कहा कि पत्रकारों को किसी भी देश के नेता से पूछताछ करने का अधिकार है, चाहे वह किस भी प्रकार का प्रश्न क्यों न हो। इस बीच, विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि विदेश के वार्तालाप में राजनयिक शिष्टाचार का पालन अनिवार्य है, लेकिन साथ ही उन्होंने पत्रकार के प्रश्न को "स्वतंत्रता की सीमा" के भीतर समझाने की कोशिश की। विदेश में भारतीय पत्रकारों का कहना है कि इस प्रकार की घटनाएँ भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकती हैं और इनसे लोकतांत्रिक मूल्यों का संज्ञान लेना जरूरी है। कई विश्लेषकों ने आशंका जताई कि यदि प्रश्नों को सार्वजनिक मंच पर जवाब नहीं दिया जाता, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धान्तों में धुंध पैदा कर सकता है। आखिरकार, इस विवाद ने यह मुद्दा फिर से उठाया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया का क्या स्थान है और क्या सरकार को सभी प्रकार के सवालों का जवाब देना चाहिए। वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण से कहा जाता है कि खुली चर्चा और सवाल-जबाब ही लोकतंत्र को जीवित रखता है; किसी भी सरकार को उन सवालों से बचना नहीं चाहिए जो जनता के हित में हों। इस प्रकार, मोदी की इस प्रतिक्रिया ने न केवल राष्ट्रीय राजनीति में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और मीडिया स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न उठाये हैं।