एक नॉर्वेजियन समाचारपत्र ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को साप-चारा (सांसारिक) रूप में दर्शाते हुए मिलियन-व्यापी इंटरनेट पर तीव्र विवाद को उभारा है। अपने लेख में, उस दैनिक ने मोदी को एक जालसाज़ साप-चारा कलाकार के रूप में प्रस्तुत किया, जहाँ वह साप की लहरों के बीच अपने झुंड को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। इस कार्टून को कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने तत्काल 'नस्लवादी' और 'औपनिवेशिक मनोवृत्ति' का प्रतीक कहा। टिप्पणीकारों ने कहा कि ऐसे चित्रण में भारतीय लोकतंत्र और उसके नेतृत्व को बदनाम करने की एक सटीक नीति निहित है, जो ऐतिहासिक उपनिवेशी शोषण की याद दिलाता है। पत्रकारिक स्वतंत्रता के नाम पर इस कार्टून को प्रकाशित करने के बाद, नॉर्वे में विभिन्न नागरिक गठजोड़ और अंतर्राष्ट्रीय इस्राइलियों की आवाज़ों ने इस घटना को कड़ी निंदा की। कई प्रमुख स्वतंत्रतावादी संगठनों ने कहा कि यह व्यंग्य नहीं, बल्कि एक जानबूझकर तैयार किया गया अपमान है, जो भारतीय जनता के भीतर गहरी भावनात्मक जड़ें तोड़ता है। इंटरनेट पर चल रही बहस में लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि किसी भी देश के प्रमुख को इस तरह की जातीय और सांस्कृतिक भावनाओं के खिलौने में बदलना एक हिंसात्मक बिचारधारा का समर्थन है। इस मुद्दे पर भारतीय राजनयिक प्रतिनिधियों ने भी कड़ाई से प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय ने कहा कि ऐसी निंदात्मक तथा निंदा योग्य चित्रण के कारण भारत-नॉर्वे संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है, और इस प्रकार के कृत्यों से दोनों देशों के बीच मित्रता और सहयोग कमज़ोर हो सकता है। साथ ही, कई भारतीय राजनेताओं ने भी इस कार्टून को अस्वीकार्य कहा और नॉर्वेजियन प्रेस को स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने कहा कि चाहे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो, लेकिन उसी के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी चाहिए, जिससे किसी भी राष्ट्रीय या सांस्कृतिक समूह के प्रति अपमानजनक व्यवहार न किया जाए। आखिरकार, नॉर्वेजियन दैनिक ने अपना कार्टून हटाने और सार्वजनिक माफी माँगने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि उनका इरादा कोई नस्लवादी या अनादरपूर्ण नहीं था, बल्कि यह एक वैचारिक व्यंग्यात्मक टिप्पणी थी। फिर भी कई विशेषज्ञों ने इस निर्णय को अपर्याप्त बताया, क्योंकि यह घटना दर्शाती है कि आज के डिजिटल युग में आकस्मिक या लक्ष्यित अपमान के प्रभाव कितने गहन हो सकते हैं। यह मामला न केवल कड़ी आलोचना का विषय बना, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिक मानकों पर फिर से सवाल उठाने का कारण भी बना।