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Breaking News: सुप्रीम कोर्ट ने उजागर किया अपना ही संदेह: उमर खलीद के गिरफ़्तारी के ‘जेल को अपवाद’ बना दिया बंधन
🕒 1 day ago

सुप्रीम कोर्ट ने उमर ख़ालीद के मामले में अपने ही पूर्वनिर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि जेल फेंसे का सिद्धांत सामान्य है और जमानत देना अपवाद है, चाहे वह उन्नत उग्रवादी (UAPA) केस ही क्यों न हो। जुलाई 2026 में सुनवाई के दौरान एचसी ने यह टिप्पणी की कि अदालत ने अक्सर जमानत को अधिकार के रूप में माना है, परन्तु जब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कड़ी धाराओं, विशेषकर उग्रवादी (UAPA) लागू होते हैं, तो ग़ैरहाज़िर रहने को सजा के रूप में देखा जाता है। इस कारण उमर ख़ालीद को बंधक बनाए रखी गई जमानत को ‘अपवाद’ कहा गया, जबकि उच्चतम न्यायालय ने पहले कई मामलों में यह स्थापित किया था कि 'जमानत नियम है, जेल अपवाद'। यह विरोधाभासी रुख उसी क्रम में आया जब दिल्ली पुलिस ने उग्रवादी (UAPA) के तहत बेमेल जमानत प्रतिबंधों को लेकर एक बड़ी बेंच की सहायता माँगी। कई निदेशालयी मामलों में विभिन्न बेंचों ने प्रथम बार जमानत को प्रतिबंधित करने का दिशा-निर्देश दिया था, जिसके कारण अभियोंत्र माना जा रहा है कि न्याय व्यवस्था में असंगतता उत्पन्न हुई। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत के अधिकार को नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता के रूप में मानना चाहिए, तथा इसके अपवाद को मात्र 'सुरक्षा' के नाम पर लाना उचित नहीं है। उमर ख़ालीद के वकीलों ने कई बार जमानत की मांग की थी, परन्तु दलील यह थी कि उनके क्लाइंट की माँ बीमार हैं और उन्हें देखभाल की जरूरत है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह निवेदन भी खारिज कर दिया, यह कहकर कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य संबंधी कारणों से जमानत को अनैतिक रूप से निलंबित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि कानूनी प्रक्रिया में कोई भी अपवाद नहीं हो सकता, और यदि लागू क़ानून की धारा स्पष्ट रूप से जेल को अनिवार्य बताती है, तो वही लागू होगा। न्यायालय की इस प्रवृत्ति ने देश में व्यापक बहस छिड़ा दी है। कई कानूनी विश्लेषकों ने कहा कि 'जमानत नियम है, जेल अपवाद' का सिद्धांत जब तक सुस्पष्ट रूप से लागू न हो, तब तक न्यायपालिका में संदेह की स्थिति बनी रहेगी। उनके अनुसार, यदि अत्यधिक सुरक्षा कारणों से भी जमानत को प्रतिबंधित किया जाता है, तो उसे विशेष कारणों के साथ स्पष्ट रूप से दस्तावेज़ित करना आवश्यक है, ताकि वैधता और नियमबद्धता बनी रहे। अंत में कहा गया कि इस प्रकार के निर्णयों को पुनः विचारणीय बनाना चाहिए, ताकि न्याय के मूल सिद्धान्त—समानता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता—का पालन हो सके।

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✍️ By Pradeep Yadav | 19 May 2026