राष्ट्रीय विधि परिषद के सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत ने हाल ही में बेरोजगार युवाओं को लेकर कड़ी टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने उन्हें "कॉकरोच (तिलचट्टे)" के रूप में चित्रित किया। यह बयान विभिन्न मंचों पर सुना गया, जब कई युवा बेरोजगारी के कारण सामाजिक मीडिया, आरटीआई (सूचना के अधिकार) अभियानों और विभिन्न प्रकार की सार्वजनिक वाद-विवाद में सक्रिय हो रहे थे। उनका मत था कि ये युवा निरर्थक रूप से हर किसी पर निशाना साधते हुए, न केवल अदालतों और विधिक प्रणाली को बल्कि सामाजिक शांति को भी प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन्हें "परजीवी" कहा जा सकता है, क्योंकि यह लोग सच्ची नियोजन के बिना ही, अकारण ही नफरत और विरोध के मंच बनाते हैं। इन टिप्पणियों के बाद कई प्रमुख समाचार एजेंसियों ने इस मुद्दे पर प्रकाश डाला। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि कई युवा संकीर्ण अवसरों की खोज में वैध कार्यों से दूर हो कर, RTI (सूचना का अधिकार) केसों को दुरुपयोग करते हुए, सामाजिक मंचों पर निरन्तर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इन क़दमों से कुछ मामलों में असली मुद्दे हल हो रहे हैं, परंतु यह भी स्पष्ट हो रहा है कि ऐसे युवा अक्सर निरर्थक आंदोलन में फँस जाते हैं, जिससे उनींदापन और सामाजिक विभाजन की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके अलावा, उन अभियोजनियों और वकीलों के बारे में भी चेतावनी दी गई, जिनके पास शैक्षणिक योग्यता पर प्रश्न उठता है। कई छद्म-वकील बिना उचित प्रमाण पत्र के कोर्ट में पेश होते हैं, जिससे न्याय प्रणाली का सम्मान घटता है। सीजेआई ने उल्लेख किया कि इस समस्या को सुलझाने के लिये एक विशेष जांच एजेंसी, जैसे कि सीबीआई, को नियुक्त करना आवश्यक है, ताकि फ़र्जी डिग्रियों का पता लगाया जा सके और जेल की सजा के साथ-साथ न्याय के मूल सिद्धांतों को कायम रखा जा सके। इन विवादों के बीच समाज में एक व्यापक चर्चा चल रही है कि क्या बेरोजगार युवाओं को इस तरह कड़वे शब्दों में बंधक बनाना उचित है? कई विचारकों का मानना है कि सामाजिक मंचों की सक्रियता को सामाजिक बदलाव की दिशा में उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते कि वह सकारात्मक और निर्माणात्मक हो। सरकार को भी रोजगार के अवसर बढ़ाने, कौशल विकास और स्टार्ट‑अप इकोसिस्टम को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, ताकि इन युवा शक्ति को सकारात्मक दिशा मिले। अंत में कहा जा सकता है कि सीजेआई सूर्यकांत के बयान ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है: बेरोजगार युवाओं की असंतुष्टि, उनके सामाजिक आवाज़ बनने की इच्छा, और न्यायिक प्रणाली में शैक्षणिक समझौते की कमी। यह जरूरी है कि सरकार, न्यायपालिका और सामाजिक संगठनों के बीच मिलकर एक संतुलित नीति बनायी जाये, जिससे युवा वर्ग का सशक्तिकरण हो, और साथ ही न्याय प्रणाली का विश्वास भी बरकरार रहे।