जैसे ही पश्चिम एशिया में इज़राइल-फ़िलिस्तीन के झड़ते संघर्ष में नई चरम सीमा पर पहुंच गया, ईरान का क्षेत्रीय भूमिका और उसके साथ बढ़ते तनाव ने ब्रिक्स समूह के भीतर चिंताओं की लहर दौड़ा दी है। जिसका मूल कारण ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ता विरोध, ऊर्जा सुरक्षा, तथा आर्थिक प्रतिबंधों की कसौटी है। इस लेख में हम विस्तार से देखते हैं कि कैसे ईरान का संघर्ष ब्रिक्स के आर्थिक, राजनैतिक और रणनीतिक लक्ष्यों को प्रभावित कर रहा है और कौन‑से कदम समूह इस चुनौती का सामना करने के लिए उठाने की कोशिश कर रहा है। ईरान-इज़राइल तनाव का बढ़ना न केवल मध्य पूर्व में अस्थिरता को जन्म देता है, बल्कि इसकी ऊर्जा बाजार पर महंगाई के प्रभाव भी महसूस होते हैं। विश्व में तेल की कीमतों में अस्थिरता ब्रिक्स के प्रमुख सदस्य जैसे भारत, ब्राज़ील और रूस को सीधे प्रभावित करती है, क्योंकि वे अपने आयात‑निर्यात संतुलन को बनाए रखने के लिए स्थिर ऊर्जा कीमतों पर निर्भर हैं। ईरान के साथ भारत का बढ़ता ऊर्जा सहयोग, जैसा कि दक्कन हेरेड रिपोर्ट करता है, इस तनाव के बीच एक दोधारी तलवार बन गया है; जबकि भारत को सस्ता तेल मिलने की संभावना है, वहीं ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण निवेश जोखिम भी बढ़ गया है। ब्रिक्स के सदस्य देशों ने इस संकट को संबोधित करने के लिए विभिन्न मंचों पर अपने विचार प्रकट किए हैं। ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में ईरान को अधिक समावेशी बनाकर आर्थिक प्रतिबंधों को हटा देने का प्रस्ताव रखा है, जिससे ईरान की आर्थिक पुनरुज्जीवन संभव हो सके। वहीं, रूस ने सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा है कि ईरान के खिलाफ कोई भी सैन्य कार्रवाई पूरे ब्रिक्स गठबंधन को जोखिम में डाल सकती है। भारत ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में कहा कि स्ट्रेट ऑफ़ हॉरमुज़ की सुरक्षा और गाज़ा में शांति की गारंटी के बिना कोई भी आर्थिक सहयोग स्थायी नहीं हो सकता, इस प्रकार उसने मध्य पूर्व में शांति प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है। इन सबके बीच, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने विस्तारित सदस्यता की मांग की है, जिससे वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपने प्रभाव को बढ़ा सके और ईरान संकट में संतुलित भूमिका निभा सके। इस मांग का उद्देश्य ब्रिक्स के देशों को एक साथ लाकर वैश्विक शासन में सुधार लाना है, जबकि पश्चिमी जियोपोलिटिकल दबावों से बचना है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के भीतर सुधार की प्रक्रिया धीमी है और इससे ब्रिक्स की सामूहिक आवाज़ में अड़चनें आती हैं। निष्कर्षतः, ईरान संघर्ष न केवल मध्य पूर्व में बल्कि ब्रिक्स समूह के भीतर भी एक जटिल चुनौती पेश कर रहा है। ऊर्जा कीमतों का उतार-चढ़ाव, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, और सुरक्षा जोखिम सभी मिलकर ब्रिक्स के आर्थिक सहयोग को जटिल बना रहे हैं। यदि यह समूह अपनी रणनीतिक इकाई को बनाए रखना चाहता है, तो उसे ईरान के साथ वार्ता, ऊर्जा सुरक्षा, और संयुक्त राष्ट्र में सुधार के मुद्दों को एकत्रित रूप से हल करने की आवश्यकता होगी। यह समय है कि ब्रिक्स सदस्य प्रभावी संवाद और समान नीति निर्धारण के माध्यम से इस संकट को अवसर में परिवर्तित करें, ताकि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मंच पर उनकी भूमिका और भी सुदृढ़ हो सके।