सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री धनंजय कुमार ने हाल ही में युवाओं के रोजगार रहित रहने को लेकर कड़ी आलोचना की और उनकी तुलना "कोकरों" से की, जिससे देशभर में तीव्र प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न हुईं। उनका कहना था कि कई बेरोजगार युवा सिर्फ़ सामाजिक मीडिया पर शोर मचाने, आरटीआई जैसी गतिविधियों में उलझने, और कभी‑कभी न्यायालयीन मामलों में लगातार याचिका दायर करके न्याय प्रणाली को बोझिल बना रहे हैं। यह टिप्पणी विभिन्न प्रमुख समाचार साइटों पर प्रकाशित हुई, जिनमें टेलीग्राफ इंडिया, टाइम्स ऑफ इंडिया, एनडीटीवी और इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित माध्यम शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी न्यायालय के कई सत्रों में सुनवाई के दौरान की, जहाँ कई बार वही युवा वकीलों और सिविल याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक ढंग से परेशान कर रहे थे। उन्होंने उन्हें "कोकरों" की तरह निरन्तर बढ़ते और पीछे हटते नहीं देखे, बल्कि न्यायालय के काम को बाधित करने के लिए लगातार नई-नई याचिकाएँ दायर करके व्यवस्था को झंझट में डालते देखा। इस तुलना से यह स्पष्ट होता है कि वे इस प्रकार के व्यवहार को सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण के लिए हानिकारक मानते हैं। विरोधी पक्ष ने इस बयान को अत्यधिक कठोर और युवाओं के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाला माना। कई युवा वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर इस पर तीखा विरोध किया, यह तर्क देते हुए कि अर्जित अधिकार, पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न भाग है। उन्होंने कहा कि युवा वर्ग का सामाजिक मीडिया और आरटीआई के माध्यम से जागरूकता फैलाना ही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने का प्रयास भी न्याय व्यवस्था को मजबूत करता है। इस विवाद का असर न्यायालय के भीतर भी देखा गया। एक वरिष्ठ वकील को बार‑बार याचिकाएँ दायर करने पर 'सलंग्न' कहा गया और उन्हें सत्र में डांटा गया, जिससे न्यायिक कार्य में भी तनाव बढ़ता दिखा। न्यायालय ने यह भी अभिप्रेत किया कि हल्के‑फुलके मामलों में बार‑बार दायरियों से न्यायाधीशों और वकीलों दोनों का समय बर्बाद होता है, जिससे वास्तविक पीड़ितों के मामलों में देरी होती है। निष्कर्ष के तौर पर, सीजेआई के ये बयान युवाओं के असंतोष और सामाजिक परिवर्तन की चाह को प्रतिबिंबित करने के साथ ही न्यायिक प्रणाली की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल उठाते हैं। जबकि न्यायालय को अपने कार्य में सुगमता और प्रभावशीलता के लिए अनुचित याचिकाओं से बचना चाहिए, वहीं युवा वर्ग को भी अपने अधिकारों का प्रयोग जिम्मेदारी और रचनात्मकता से करना आवश्यक है। इस संघर्ष के समाधान के लिए दोनों पक्षों को संवाद की राह अपनानी होगी, ताकि सामाजिक मीडिया और आरटीआई जैसे साधनों का उपयोग राष्ट्र के विकास के लिए सकारात्मक रूप से किया जा सके, न कि न्याय व्यवस्था को बाधित करने के लिए।