भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच इस शुक्रवार को ऊर्जा सहयोग को और गहरा करने के उद्देश्य से कई प्रमुख समझौते किए जाने वाले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दुबई यात्रा के दौरान दो देशों के नेतृत्व ने एलपीजी (लिक्विड पेट्रोलियम गैस) आपूर्ति, रणनीतिक तेल भंडारण और संबंधित तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ करने के लिए व्यापक समझौते पर दस्तखत करने का एतिहासिक फैसला किया। इस पहल का मकसद न केवल दोनों देशों के ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता और विश्वसनीयता भी प्रदान करना है। एलपीजी के क्षेत्र में, भारत को यूएई से सस्ता और निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लंबी अवधि के अनुबंधों की बात की गई है। यह कदम भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग को कवर करने और घरेलू एलपीजी कीमतों को स्थिर रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। साथ ही, यूएई को भारत के मौजूदा एलपीजी रिसीविंग टर्मिनलों में तकनीकी सहायता और बुनियादी ढांचे के उन्नयन हेतु सहयोग करने की पेशकश की गई है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी संभावित बाधा को न्यूनतम किया जा सके। रणनीतिक तेल भंडारण के संदर्भ में, दोनों देशों ने अपने-अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिज़र्व (एसपीआर) को बढ़ाने के लिए मिलकर कार्य करने का संकल्प लिया। यूएई के पास व्यापक समुद्री भंडारण सुविधाएँ हैं, जबकि भारत ने हाल ही में अपने एसपीआर में उल्लेखनीय वृद्धि की घोषणा की है। इस समझौते के तहत, दोनों पक्ष एक-दूसरे के भंडारण क्षमताओं का संयुक्त उपयोग कर सकते हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में तेल आपूर्ति में कोई खाई न बन सके। यह पहल द्विपक्षीय ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा प्रतिबद्धताओं को भी साकार करती है। इस ऊर्जा समझौते के अलावा, भारत और यूएई के बीच तकनीकी सहयोग, ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विकास और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए संयुक्त शोध परियोजनाओं पर भी चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि वे भविष्य में हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जैसी उन्नत तकनीकों को अपनाकर ऊर्जा संक्रमण को तेज करेंगे। इससे न केवल आर्थिक लाभ होगा, बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता के लक्ष्य भी पूरे होंगे। कुल मिलाकर, यह ऊर्जा साझेदारी भारत-यूएई संबंधों की एक नई दिशा को दर्शाती है। प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरे में यह समझौता न केवल व्यापारिक अवसरों को विस्तारित करेगा, बल्कि दोनों देशों के ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी विकास और पर्यावरणीय लक्ष्यों को साकार करने में प्रमुख भूमिका निभाएगा। इस प्रकार, भारतीय ऊर्जा नीति को अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से सुदृढ़ करने का एक महत्वपूर्ण कदम यह समझौता बन गया है।