विदेश मंत्रालय के प्रमुख संजीव जयशंकर ने हाल ही में ब्रिक्स देशों की बैठक में किए गए अपने बयान में अमेरिकी एकतरफा प्रतिबंधों की कड़ी आलोचना की। यह बयान अमेरिकी सरकार के रूसी तेल पर लगे मुअफ़त (छूट) के समाप्त होने के कुछ ही दिन पहले आया, जब विश्व ऊर्जा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव की आशंकाएँ बढ़ रही थीं। जयशंकर ने कहा कि अमेरिका द्वारा अनायास और एकतरफा तौर पर उठाए गये आर्थिक दबाव न केवल अंतरराष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध हैं, बल्कि वैश्विक व्यापार प्रणाली को भी अस्थिर कर सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि ऐसी नीतियों का उद्देश्य केवल अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाना है, जबकि अन्य देशों को पीछे धकेलना है। ब्रिक्स देशों की इस बैठक में ईरान ने भी अमेरिकी दबाव के खिलाफ एकजुटता का आह्वान किया, जिससे भारत के विदेश मंत्री के बयानों का महत्व और भी बढ़ गया। जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका द्वारा दी गई रूसी तेल की छूट समाप्त होने से पहले ही कई देशों ने संगठित रूप से विरोध की स्थितियां बना ली हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि अमेरिका ने अपने अप्रत्यक्ष आर्थिक हथियारों का प्रयोग जारी रखा, तो यह विश्व आर्थिक व्यवस्था में विश्वास को कमज़ोर कर देगा और विकासशील देशों के विकास को बाधित करेगा। इस बातचीत के दौरान जयशंकर ने ‘एकतरफ़ा जबरन कदम’ और ‘कोरासिव सैन्सर’ शब्दों का प्रयोग कर अमेरिकी नीतियों को ताना-बाना किया। उन्होंने कहा, “अमेरिका का यह रवैया अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना को क्षीण करता है और अंतरराष्ट्रीय कानून की पवित्रता को धूमिल करता है। हमें एकसाथ मिलकर इस दबाव को तोड़ना होगा और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में संतुलन बनाए रखना होगा।” इस पर कई देशों के प्रतिनिधियों ने समर्थन जताया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक सहयोग को मजबूती से आगे बढ़ाने की जरूरत है। अंत में जयशंकर ने कहा कि भारत का लक्ष्य विश्व शांति, स्थिरता और समृद्धि के सिद्धांतों के साथ मिलकर आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देना है। उन्होंने भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि कोई भी देश एकतरफे आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बिगाड़ नहीं सकता। इस प्रकार, जयशंकर के इस प्रखर बयान ने न केवल अमेरिकी नीतियों को चुनौती दी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सक्रिय भूमिका को भी स्पष्ट किया।