राजस्थान के शुष्क और चुनौतीपूर्ण भूभाग में, जहां जल की कमी पीढ़ियों से एक गंभीर अस्तित्वगत चुनौती बनी हुई है, पद्मश्री सुंडाराम वर्मा की प्रेरणादायक यात्रा अटूट समर्पण और पर्यावरण संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती है। सीकर जिले के दांतारामगढ़ में जन्मे सुंडाराम वर्मा ने एक अलग मार्ग चुना और पारिस्थितिक क्षरण तथा जल संकट से मुकाबला करने के लिए अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण को अपने जीवन का मिशन बना लिया। उनके इस असाधारण संकल्प ने न केवल मरुस्थलीय क्षेत्रों में पारंपरिक वृक्षारोपण के नियमों को बदला है, बल्कि पूरे मरु प्रदेश में पर्यावरणीय पुनरुद्धार के लिए एक टिकाऊ रूपरेखा भी प्रदान की है।
इस उल्लेखनीय परिवर्तन की नींव वर्ष 1972 में रखी गई जब सुंडाराम वर्मा ने विज्ञान विषय में स्नातक की डिग्री पूरी की। उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक समझ से लैस होने के कारण उनके पास वे अवसर थे जिनके सपने उस दौर के युवा स्नातक देखा करते थे। अपनी असाधारण शैक्षणिक योग्यता का प्रदर्शन करते हुए, उनका चयन तीन अलग-अलग अवसरों पर सरकारी विज्ञान शिक्षक के पद पर हुआ। हालांकि, सुरक्षित सरकारी नौकरी की पारंपरिक सामाजिक अपेक्षाओं को दरकिनार करते हुए, वर्मा ने तीनों नौकरी के प्रस्तावों को अस्वीकार करने का अभूतपूर्व निर्णय लिया और इसके बजाय अपना जीवन, बुद्धि और श्रम कृषि तथा पर्यावरण संरक्षण को समर्पित कर दिया।
प्रदेश की गंभीर जल कमी के व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए दृढ़ संकल्पित वर्मा ने व्यापक कृषि प्रयोग शुरू किए, जिसका परिणाम वर्ष 1995 में एक बड़ी सफलता के रूप में सामने आया। उन्होंने एक ऐसी अभूतपूर्व शुष्क भूमि कृषि और वनरोपण तकनीक विकसित की जिसने सिंचाई के संबंध में पारंपरिक मान्यताओं को पूरी तरह से चुनौती दी। शुरुआती रोपण चरण के दौरान केवल एक लीटर पानी का उपयोग करते हुए, उनकी यह पद्धति कम बारिश से मिलने वाली प्राकृतिक मिट्टी की नमी को सहेजने पर ध्यान केंद्रित करती है, जिससे बिना किसी निरंतर कृत्रिम सिंचाई या व्यापक जल बुनियादी ढांचे के पौधे लंबे समय तक जीवित रहते हैं और विकसित होते हैं।
इस अग्रणी तकनीक के मूर्त परिणाम इसकी वैज्ञानिक व्यवहार्यता और व्यावहारिक दक्षता की पूरी गवाही देते हैं। नमी संधारण, मल्चिंग और वर्षा जल संचयन के इस अभिनव दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए, राजस्थान के कई सूखा-प्रवण जिलों में दो लाख से अधिक पौधे सफलतापूर्वक लगाए और पाले जा चुके हैं। वर्मा ने केवल पौधे नहीं लगाए, बल्कि उन्होंने अपने खेत में बारिश की हर एक बूंद को रोकने के लिए अथक परिश्रम किया, जिससे यह साबित हुआ कि पारंपरिक ज्ञान और अभिनव संरक्षण पद्धतियों का मेल मरुस्थलीकरण को उलट सकता है और स्थानीय जलवायु में सुधार ला सकता है।
वर्मा के कृषि नवाचारों का व्यापक प्रभाव उनके गृह जिले सीकर से बहुत आगे तक फैला है, जो संपूर्ण कोटपुतली-बहरोड़ क्षेत्र और आसपास के अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए गहरे सबक प्रदान करता है। घटते भूजल स्तर और अनिश्चित मानसून पैटर्न से जूझ रहे स्थानीय कृषक समुदाय अपनी आजीविका सुरक्षित करने के लिए ऐसे स्वदेशी वैज्ञानिक हस्तक्षेपों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। नमी संरक्षण और विवेकपूर्ण जल उपयोग के एकीकरण ने स्थानीय दृष्टिकोण को बदल दिया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक व्यवहार्यता और पारिस्थितिक स्थिरता एक साथ चल सकती हैं।
उनके जमीनी पर्यावरणीय योगदान के विशाल स्वरूप को पहचानते हुए, विभिन्न प्रशासनिक निकायों, कृषि विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज संगठनों ने उनकी कार्यप्रणाली का दस्तावेजीकरण और अध्ययन किया है। हालांकि वर्मा का कार्य पर्यावरणीय प्रतिकूलता के विरुद्ध एक अकेले व्यक्ति के संघर्ष के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन इसने अंततः व्यापक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा अर्जित की। सरकारी कृषि विस्तार कार्यक्रमों ने शुष्क क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को कम करने के लिए ऐसी कम लागत वाली और उच्च दक्षता वाली पारंपरिक नवाचारों को बढ़ावा देने की आवश्यकता को तेजी से स्वीकार किया है।
भविष्य की ओर देखते हुए, पद्मश्री सुंडाराम वर्मा की यह विरासत पर्यावरणविदों और कृषकों की भावी पीढ़ियों के लिए आशा और व्यावहारिक कार्रवाई का एक स्थायी प्रकाशस्तंभ बनी हुई है। दशकों की अपनी निरंतर सेवा के सम्मान में वर्ष 2020 में प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त करने वाले वर्मा आज भी युवा किसानों का मार्गदर्शन करते हैं और टिकाऊ भूमि प्रबंधन प्रथाओं की वकालत करते हैं। जैसे-जैसे जल स्तर नीचे गिर रहा है और पर्यावरणीय चुनौतियां बढ़ रही हैं, उनकी ये अग्रणी तकनीकें संपूर्ण ग्रामीण भारत में पारिस्थितिक संतुलन और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए एक स्पष्ट और क्रियान्वयन योग्य मार्गदर्शिका प्रदान करती हैं।