गणेश उत्सव के पावन पर्व के दौरान जोधपुर में पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी और प्रेरणादायक मिसाल देखने को मिली है, जिसने पारंपरिक आस्था और आधुनिक पर्यावरण प्रेम का एक बेहतरीन समन्वय प्रस्तुत किया है। स्थानीय पर्यावरण प्रेमी सूरजमल पंवार ने अपनी रचनात्मकता और समर्पण का परिचय देते हुए दूब घास से भगवान गणेश की एक अद्भुत और हरित प्रतिमा को सफलतापूर्वक साकार किया है। इस अनूठी पहल ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि पूरे क्षेत्र में उत्सव मनाने के एक नए और पर्यावरण-अनुकूल दृष्टिकोण को जन्म दिया है।
इस हरित गणेश प्रतिमा के निर्माण की पृष्ठभूमि पारंपरिक उत्सवों के दौरान होने वाले पर्यावरण प्रदूषण और रासायनिक मूर्तियों के विसर्जन से उत्पन्न होने वाली चिंताओं से जुड़ी हुई है। इस प्रकार की समस्याओं के समाधान के रूप में, सूरजमल पंवार ने एक ऐसा मार्ग चुना जो धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का पूर्ण सम्मान करता है, साथ ही प्रकृति के संरक्षण का मजबूत संदेश भी देता है। भगवान गणेश की पूजा में दूब का विशेष धार्मिक महत्व होता है, और इसी दूब का उपयोग करके प्रतिमा का निर्माण करना आस्था और प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को दर्शाता है।
इस भव्य और अनूठी प्रतिमा के निर्माण में शामिल आंकड़ों और तकनीकी बारीकियों पर नजर डालें तो यह कार्य अत्यंत श्रमसाध्य और समर्पण की मांग करने वाला था। इस पूरी परियोजना को धरातल पर उतारने में कुल एक महीने का लंबा समय लगा। इस दौरान निरंतर मेहनत करते हुए लगभग 11 किलो दूब का उपयोग किया गया। तैयार की गई यह प्रतिमा तीन फीट ऊंची है, जिसे बिना किसी हानिकारक रसायन या सिंथेटिक सामग्री के केवल प्राकृतिक दूब और पारंपरिक तरीकों से गढ़ा गया है, ताकि इसकी पवित्रता और पर्यावरण-मित्रता बरकरार रहे।
इस असाधारण कलाकृति को देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, श्रद्धालु और पर्यावरणविद पहुंच रहे हैं, जो इसकी शिल्प कला और इसके पीछे छिपे संदेश की सराहना कर रहे हैं। समाज के विभिन्न वर्गों का मानना है कि इस प्रकार की पहलें नई पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का एक प्रभावी माध्यम बनती हैं। यह आयोजन साबित करता है कि हमारी संस्कृति और परंपराएं हमेशा से प्रकृति के संरक्षण की सीख देती आई हैं, और उन्हें आधुनिक समय में भी आसानी से अपनाया जा सकता है।
इस प्रकार की पहल का प्रभाव केवल जोधपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कोटपूतली-बहरोड़ सहित आसपास के अन्य जिलों के समुदायों और पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बन रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर लोग अब अपने आगामी त्योहारों में इस प्रकार के हरित विकल्पों को अपनाने पर विचार कर रहे हैं। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में एक सकारात्मक संवाद को जन्म दिया है, जिससे सामुदायिक स्तर पर पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और अधिक गहरी हुई है।
स्थानीय प्रशासन और नगर निकायों ने भी इस प्रकार के स्वैच्छिक और पर्यावरण-अनुकूल प्रयासों की खुले दिल से सराहना की है। त्योहारों के दौरान उत्पन्न होने वाले कचरे और प्रदूषण की समस्या से निपटने में ऐसी पहलें प्रशासनिक व्यवस्था का बोझ कम करती हैं और जनसहयोग का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के प्रयासों को बढ़ावा मिलने से भविष्य में सार्वजनिक आयोजनों को अधिक स्वच्छ और हरित बनाया जा सकेगा।
इस पूरी पहल का सबसे महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक हिस्सा इसका आगामी चरण यानी प्रतिमा का विसर्जन और पुनर्स्थापन है। पारंपरिक तरीकों के विपरीत, इस 11 किलो दूब से बनी प्रतिमा का विसर्जन किसी जल स्त्रोत को प्रदूषित किए बिना एक पार्क में किया जाएगा, जहां इसे दोबारा लगाया जाएगा। इस प्रकार गणपति की यह पवित्र प्रतिमा विसर्जन के बाद भी जीवित रहकर हरियाली को बढ़ावा देगी, जिससे आस्था और पर्यावरण संरक्षण का यह संदेश लंबे समय तक लोगों के बीच जीवंत बना रहेगा।