जयपुर नगर निगम के प्रशासनिक गलियारों में वित्तीय पारदर्शिता और सरकारी धन के व्यय को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, निगम की उद्यान शाखा द्वारा महज आठ महीने की समयावधि के भीतर विभिन्न 35 आयोजनों के लिए 17 लाख रुपये से अधिक की फूल-मालाओं की खरीद की गई है। इस पूरी खरीद प्रक्रिया के दौरान केवल एक ही व्यावसायिक फर्म से सामग्री ली गई, जिससे प्रक्रियात्मक नियमों और प्रतिस्पर्धात्मक निविदा प्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
जयपुर नगर निगम की उद्यान शाखा का प्राथमिक दायित्व शहर के उद्यानों का रख-रखाव, शहरी हरियाली का संवर्धन और नागरिक आयोजनों में व्यवस्थाएं संभालना है। सामान्यतः, निकाय स्तर पर किसी भी प्रकार की सरकारी खरीद के लिए निर्धारित वित्तीय सीमाओं, खुली निविदाओं और निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य होता है। हालांकि, आठ महीने जैसे अल्प समय में केवल पुष्प मालाओं के मद में इतनी बड़ी राशि का व्यय होना और वह भी एकल फर्म के माध्यम से होना, विभाग की आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
मामले से जुड़े आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जयपुर में आयोजित कुल 35 कार्यक्रमों के दौरान सजावटी और औपचारिक फूल-मालाओं के बिल 17 लाख रुपये के पार पहुंच गए। आठ महीने के अंतराल में प्रति कार्यक्रम औसतन भारी-भरकम राशि केवल पुष्प सज्जा पर व्यय की गई। एक ही व्यावसायिक संस्थान को बार-बार ठेका दिया जाना और प्रतिस्पर्धात्मक दरों की उपेक्षा किया जाना निकाय की वित्तीय कार्यप्रणाली पर संदेह उत्पन्न करता है।
इस मामले के सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों, करदाताओं और प्रशासनिक विश्लेषकों में चिंता व्याप्त है। जनसामान्य का मानना है कि जनता के टैक्स से अर्जित राजस्व का उपयोग मूलभूत जनसुविधाओं, सड़कों के निर्माण और स्वच्छता व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए किया जाना चाहिए, न कि औपचारिक आयोजनों में अत्यधिक भव्यता दर्शाने के लिए। नागरिक संगठनों ने इस समूची खरीद प्रक्रिया की स्वतंत्र वित्तीय जांच कराने और दोषियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।
जयपुर नगर निगम में उजागर हुई इस अनियमिता का प्रभाव कोटपूतली-बहरोड़ जिले सहित आसपास के अन्य क्षेत्रीय निकायों की कार्यप्रणाली पर भी पड़ता दिख रहा है। प्रादेशिक स्तर पर जयपुर के प्रशासनिक निकायों को एक आदर्श मॉडल के रूप में देखा जाता है। ऐसे में प्रांतीय राजधानी में वित्तीय सतर्कता के अभाव से सीख लेते हुए निकटवर्ती जिला प्रशासनों और नगर परिषदों में भी खरीद प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता रेखांकित हुई है।
प्रशासनिक मानकों के अनुसार, ऐसी वित्तीय विसंगतियों के सामने आने पर ऑडिट और लेखा जांच दल द्वारा संबंधित दस्तावेजों एवं वाउचरों का गहन परीक्षण आवश्यक हो जाता है। यह देखा जाना अनिवार्य है कि क्या इन 35 आयोजनों के लिए खुली निविदाएं आमंत्रित की गई थीं अथवा नियमों को शिथिल करते हुए एकल फर्म को लाभ पहुंचाया गया। 17 लाख रुपये की कुल राशि के भुगतान की स्वीकृति देने वाले सक्षम अधिकारियों और शाखा प्रमुखों की जवाबदेही तय करने की मांग जोर पकड़ रही है।
वर्तमान में नगर निगम की उद्यान शाखा पर टिकी जन-निगाहों के बीच यह आवश्यक हो गया है कि भविष्य के लिए सुधारात्मक नीतिगत कदम उठाए जाएं। आने वाले समय में औपचारिक आयोजनों के लिए व्यय की अधिकतम सीमा निर्धारित करने और सभी प्रकार की सरकारी खरीद को अनिवार्य रूप से ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल से जोड़ने की अपेक्षा की जा रही है। इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई ही सार्वजनिक धन के संरक्षण तथा प्रशासनिक साख की पुनर्स्थापना को सुनिश्चित कर सकेगी।