बंगाल के निकटतम विधानसभा चुनाव परिणामों के प्रकाशन से पहले ही दाईं ओर से एक तीव्र बाण बरसते दिखे हैं, जिससे आँजनी महारानी मांता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस को भारी झटका लगा है। पहले तो भाजपा की सख़्त जीत की संभावना को दर्शाने वाले एग्ज़िट पोल्स ने कई टीएमसी कार्यकर्ताओं को निराश कर दिया, और फिर इन सर्वेक्षणों को भाजपा के समर्थन से तैयार करने का आरोप लगा, जिससे माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। इस बीच, विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि बहुलानुसार भाजपा ने प्रदेश में आदर्श रूप से व्यापक जीत हासिल करने की योजना बना रखी है, जबकि टीएमसी को चूना नमक कर दिया गया है। एग्ज़िट पोल्स के परिणाम ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि भाजपा को निरपेक्ष रूप से अधिक वोट मिलने की संभावना है, और यह मतदाता भावना को बदलना आसान नहीं रहेगा। कई टिप्पणियों में कहा गया कि ये सर्वेक्षण भाजपा के समर्थन से तैयार किए गए थे, ताकि टीएमसी के कार्यकर्ताओं को निरुत्साहित किया जा सके और उनकी मनोवैज्ञानिक स्थिति को कमजोर किया जा सके। इस कारण, माँता बनर्जी ने कई मंचों पर इन एग्ज़िट पोल्स को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि "हम माँ, भूमि, मनुष्य की सरकार बना रहे हैं" और यह सर्वेक्षण केवल भ्रम पैदा करने का साधन हैं। पारस्परिकता की कमी और आधुनिक राजनैतिक परिदृश्य के साथ, लेखकों ने यह भी बताया कि कुछ स्थानीय राजनैतिक विश्लेषक, जैसे 'फालोड़ी सत्ता बज़र', के अनुसार, प्रवासी मतदाता और युवा वर्ग में बदलाव के कारण भाजपा की लहर अधिक मजबूत हो रही है। विशिष्ट आंकड़े दिखाते हैं कि कई उत्तरार्ध क्षेत्रों में पहले के लेफ्ट-एक्टिविस्टों ने अब भाजपा के उम्मीदवारों को समर्थन देना शुरू कर दिया है। इस बीच, टीएमसी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने कहा है कि वे इन सर्वेक्षणों को नहीं मानेंगे और असली वोटिंग प्रक्रिया के बाद ही जनता का असली विरोध स्पष्ट होगा। निष्कर्षतः, बंगाल चुनाव की तरफ़ बढ़ती हुई तैयारियों में मांता बनर्जी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। एग्ज़िट पोल्स से लेकर बीजेपी की तेज़ी से बढ़ती लोकप्रियता तक, सभी कारक मिलकर एक चुनौतीपूर्ण परिदृश्य बनाते हैं। लेकिन अंततः, वास्तविक चुनाव परिणाम ही तय करेंगे कि मातृभाषा, मातृभूमि और मनुष्यता की प्रतिज्ञा पर आधारित टीएमसी सरकार का भविष्य कैसे आकार लेगा या फिर स्याह रंग की सत्तावान लहर बिगड़ती रहेगी।