देश के न्यायिक इतिहास में एक और महत्वपूर्ण मोड़ आया जब सुप्रीम कोर्ट ने घृणा भाषण को रोकने के लिये अतिरिक्त दिशानिर्देश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा आपराधिक और साक्ष्य मानदंडों पर ही इस सामाजिक समस्या को सुलझाया जा सकता है। यह फैसला उन कई सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के आशावादी उम्मीदों के विपरीत आया, जिन्होंने नयी सख्त क़ानूनी व्यवस्था की माँग की थी। अदालत ने अपने तर्क में कहा कि भारतीय दंड संहिता, सूचना अधिनियम और इलेक्ट्रॉनिक संचार अधिनियम आदि में पहले से ही घृणा भाषण को प्रतिबंधित करने के लिये पर्याप्त प्रावधान स्थापित हैं। इन प्रावधानों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिये प्रवर्तन एजेंसियों को तत्परता और सख्ती की आवश्यकता है, न कि क़ानून में नया जोड़। न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि जब तक मौजूदा क़ानून को पूरी तरह से लागू नहीं किया जाता, तब तक कोई नया आदेश व्यर्थ रहेग। विचारधारा के विभिन्न वर्गों ने इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया व्यक्त की। कुछ ने इसको न्यायिक तटस्थता का प्रतीक कहा, जबकि अन्य ने चेतावनी दी कि बिना नया नियमन के घृणा भाषण के मामलों में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। कई वकालत समूहों ने मांग की कि पुलिस और जांच एजेंसियों को अधिक संसाधन और प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे पहले से उपलब्ध क़ानूनी धारा का उपयोग कर सकें। वहीं, कई राजनैतिक परिप्रेक्ष्य यह मानते हैं कि मौजूदा क़ानून का प्रयोग करके ही सामाजिक शांति और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा संभव है। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का मुख्य कार्य विधायी निर्माताओं की कार्यवाही को अनुचित रूप से बाधित नहीं करना है, बल्कि मौजूदा क़ानून के प्रवर्तन को सुनिश्चित करना है। इस प्रकार, घृणा भाषण के खात्मे के लिये मौजूदा प्रावधानों की पूरी ताकत का प्रयोग करना आवश्यक है, जबकि कानून निर्माताओं को सामाजिक बदलते परिदृश्य के अनुसार संशोधन करने का अवसर खुला रखना चाहिए। यह निर्णय न्यायिक परिपक्वता और विधायी तर्कसंगतता का एक उदाहरण माना जा सकता है।