नई दिल्ली में इस महीने आयोजित ब्रिक्स देशों की उच्च स्तरीय बैठक में कई प्रमुख चर्चा बिंदु तय किए गये, पर भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील एवं दक्षिण अफ्रीका का मंच इरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच चल रहे मतभेदों के कारण एक समेकित संयुक्त बयान तैयार करने में असमर्थ रहा। इस विवाद ने न केवल ब्रिक्स के सामंजस्य को प्रभावित किया, बल्कि मध्य‑पूर्व में स्थित जटिल राजनीतिक परिस्थितियों को और जटिल बना दिया। बैठक के दौरान इरान ने अपने क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं और ऊर्जा नीतियों को लेकर सतर्कता दिखाते हुए कई बिंदुओं पर अस्पष्टता बरती, जबकि यूएई ने फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी पारंपरिक समर्थन और इज़राइल‑फिलिस्तीन संघर्ष में अपनी भूमिका को रेखांकित किया। दोनों देशों के बीच भाषा, शब्दावली और शर्तों को लेकर तीव्र असहमति ने ब्रिक्स को एक समान बयान तैयार करने से रोका। इंटरैक्शन में देखा गया कि इरान ने इज़राइल की युद्ध नीतियों और दक्षिण पश्चिम एशिया में पाकिस्तान के साथ मिलकर चल रहे सैन्य गठबंधन को लेकर गंभीर आशंकाएँ व्यक्त कीं। यूएई ने इस बात पर ज़ोर दिया कि फ़िलिस्तीन की स्वतंत्रता के प्रश्न को प्राथमिकता देनी चाहिए और किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई का विरोध किया जाना चाहिए। दोनों राष्ट्रों की यह अवधारणा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनके अलग‑अलग कूटनीतिक रुख को प्रतिबिंबित करती है, जिससे ब्रिक्स के महासभा में सामूहिक सहमति बनाना मुश्किल हो गया। इस कारण, भारतीय प्रधानमंत्री ने मध्य‑पूर्व पर ध्यान केंद्रित रखते हुए शांति एवं स्थिरता की अपील की, परंतु इरान‑यूएई के बारीक मतभेदों को सरलता से सुलझा नहीं पाए। बैठक के अंत में यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिक्स को इस चरण में एकजुटता के बजाय विविध विचारों का सम्मान करना पड़ेगा। ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका ने विवादित बिंदुओं को अनिश्चित रखकर शांति प्रक्रिया में सहयोग की पुकार की, जबकि चीन ने स्थायी राजनयिक संवाद की महत्ता पर बल दिया। भारत ने मध्य‑पूर्व में शांति की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए आपसी सम्मान और संवाद को प्रमुख कहा, परंतु इरान‑यूएई के मतभेदों को लेकर कोई ठोस संयुक्त दस्तावेज़ पेश नहीं किया गया। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार का विभाजन न सिर्फ ब्रिक्स के सामरिक प्रभाव को घटाएगा, बल्कि मध्य‑पूर्व में तनाव को और बढ़ा सकता है। इरान और यूएई के बीच ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य गठबंधन और फ़िलिस्तीन मुद्दे पर चल रही असहमति, दोनों देशों के बीच भविष्य में अधिक कूटनीतिक फुर्सत की माँग करेगी। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर छोटे‑से‑छोटे मतभेद भी बड़े गठबंधन के कार्य को बाधित कर सकते हैं। इस संदर्भ में, ब्रिक्स को आने वाले महीनों में एक बार फिर से संवाद को सुदृढ़ करने, पारस्परिक आशावाद को बढ़ावा देने और समान भाषा ढूँढ़ने की आवश्यकता होगी, ताकि विश्व स्तर पर शांति एवं स्थिरता के महत्त्व को पुनः स्थापित किया जा सके।