अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में उन देशों को 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है जो अमेरिकी कंपनियों पर डिजिटल सर्विसेज टैक्स (DST) लगाते हैं। यह घोषणा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नई चुनौती पेश कर रही है, क्योंकि कई विकसित एवं विकासशील देशों ने अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए इस कर को लागू करने की योजना बनाई है। ट्रम्प का कहना है कि इस प्रकार का कर अमेरिकी कंपनियों के लिए अनुचित बोझ बनता है और इसलिए वह इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की जरूरत महसूस करते हैं। यह कदम न केवल अमेरिकी कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर और इंटरनेट सेवाओं को प्रभावित करेगा, बल्कि वैश्विक डिजिटल व्यापार के नियमों को भी बदल सकता है। ट्रम्प ने यह स्पष्ट किया कि अगर कोई भी देश डिजिटल सेवाओं पर कर लगाएगा, तो वह उस देश के सभी अमेरिकी आयात पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा देगा, जिससे अमेरिकी वस्तु और सेवाओं का मूल्य दो गुना हो जाएगा। इस नीतिके तहत यूरोप, भारत, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के कई देशों को सीधे लक्षित किया गया है, जिन्होंने या तो पहले ही DST लागू किया है या इसे लागू करने की तैयारी में हैं। कई विशेषज्ञों ने इस घोषणा को व्यापार युद्ध की ओर एक नई दिशा बताया है, जिसमें दो पक्षों के बीच आर्थिक टकराव की संभावना बढ़ गई है। देशों ने अब इस समस्या का समाधान खोजने के लिए कूटनीतिक रास्ते अपनाने शुरू कर दिए हैं। यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि ने कहा कि डिजिटल टैक्स का उद्देश्य तकनीकी कंपनियों से उचित योगदान प्राप्त करना है और यह अंतरराष्ट्रीय कर सुधारों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। भारत भी इस पहल के समर्थन में कहा कि वह डिजिटल सेवाओं से होने वाले राजस्व को सामाजिक विकास के लिए उपयोग करना चाहता है। परन्तु ट्रम्प की कठोर रुख ने कई देशों में व्यापार निर्यात को लेकर चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि 100 प्रतिशत टैरिफ का अर्थ है कि अमेरिकी उत्पादों की कीमत दुगुनी हो जाएगी, जिससे उपभोक्ताओं पर भारी बोझ पड़ेगा। निष्कर्षतः, ट्रम्प का 100 प्रतिशत टैरिफ का इशारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के संतुलन को बड़े पैमाने पर बदल सकता है। यह कदम डिजिटल सेवाओं पर कर लगाने वाले देशों के लिए एक गंभीर चेतावनी है और भविष्य में दो पक्षीय या बहुपक्षीय समझौतों की जरूरत को उजागर करता है। यदि इस विवाद को कूटनीति के माध्यम से हल नहीं किया गया, तो वैश्विक डिजिटल बाजार में तनाव बढ़ सकता है और दोनों पक्षों के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है। इस स्थिति में सभी देशों को अपने डिजिटल कर नीतियों को पुनः परखना पड़ेगा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए ढांचे की आवश्यकता होगी।