तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री सरथकुमार के नाम पर हाल ही में सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें उन्हें एक छोटी चम्मच से कुछ कतरन करने की दृश्यों को दिखाया गया। शुरुआती रिपोर्टों ने इसे "ड्रग उपयोग" के रूप में दर्ज किया, जिससे जनता में अटकलें और चर्चा छिड़ गई। लेकिन वीडियो की पूर्णता और मंत्री के बाद के बयान ने इस विवाद को काफी हद तक स्पष्ट किया। वीडियो में दिखाए गए क्षण में सरथकुमार अपने कंधे पर एक बोतल पकड़कर उसमें से कुछ पाउडर के कणों को एक प्लेट में डालते नजर आते हैं। कई नेटिज़नों ने इसे नशे की दवाओं के सेवन के संकेत के रूप में समझा, इसलिए कई समाचार पोर्टलों ने इस पर तेज़ी से "ड्रग स्कैंडल" की खबरें छापी। परंतु आगे जारी किए गए कई आधिकारिक बयानों में मंत्री ने स्पष्ट किया कि वह अपने पुत्र की बुखार की दवा को पीस रहे थे, न कि कोई प्रतिबंधित पदार्थ। उन्होंने कहा कि यह दवा एक सामान्य पैरासिटामोल टैबलेट थी, जिसे उनकी बेटी के शरीर में तेज़ी से काम करने के लिये पाउडर रूप में तैयार किया गया। इस पर कई चिकित्सकीय विशेषज्ञों ने भी समर्थन देते हुए कहा कि बच्चों के लिए कभी-कभी दवा को पीस कर देना आसान हो जाता है, विशेषकर जब बच्चा टैबलेट निगलने में असमर्थ हो। इस विवाद के बाद तमिलनाडु सरकार ने भी इस मामले पर अपना आधिकारिक बयान जारी किया। सरकार ने कहा कि मंत्री ने किसी भी अवैध पदार्थ का सेवन नहीं किया और यह पूरी तरह से एक पारिवारिक स्वास्थ्य मामला है। साथ ही, जांच एजेंसी को मामले की पूरी जाँच करने का निर्देश दिया गया। कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने भी इस बात को मान्यता दी कि कभी-कभी वीडियो का आंशिक भाग ही पूरी सच्चाई को दर्शाता है, और बिना तथ्यात्मक प्रमाण के जल्दबाजी से किसी को दोषी ठहराना अनुचित है। निष्कर्षतः, सरथकुमार के इस वीडियो ने पहले तो सोशल मीडिया पर ‘ड्रग स्कैंडल’ की आग का कारण बना, परन्तु बाद में स्पष्ट बयानों और चिकित्सकीय तर्कों ने इस सनसनी को शांत कर दिया। यह मामला यह भी सिखाता है कि वीडियो क्लिपों को संक्षिप्त रूप में देख कर तुरंत निष्कर्ष निकालना न केवल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि जनसंवाद में गलतफहमी भी पैदा करता है। आगे से ऐसी स्थितियों में तथ्यों की पुष्टि करके ही टिप्पणी करना आवश्यक रहेगा, ताकि सार्वजनिक विश्वास और लोकतांत्रिक संवाद स्वस्थ और सुदृढ़ बना रहे।