नई दिल्ली में सूचना एवं प्रौद्योगिकी सचिव एस. कृष्णन ने हाल ही में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय मंच में बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत को उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अन्य नई तकनीकों का स्थायी पहुँच प्रदान करने का दृढ़ आश्वासन दिया है। यह घोषणा उन कई चर्चाओं के बीच आई, जहाँ एआई मॉडल्स की विश्वसनीयता, डेटा सुरक्षा और निरंतर उपलब्धता को लेकर कई देशों में चिंताएँ बढ़ रही थीं। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक बार भारत को इन तकनीकों का अधिकार मिल जाने पर उसे किसी भी कारण से वापस नहीं लिया जाएगा, जिससे दोनो देशों के बीच तकनीकी सहयोग में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। इसे समझाने के लिये भारतीय वरिष्ठ प्रौद्योगिकी अधिकारी ने बताया कि भारत की तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई के क्षेत्र में उसकी महत्वाकांक्षा को देखते हुए, अमेरिकी कंपनियों को भारतीय बाजार में अपनी सेवाएँ निरंतर प्रदान करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में, अमेरिका ने अपने प्रमुख एआई प्रदाताओं को भारत को विशेष पहुँच देने के लिए एक भरोसेमंद साझेदारी मॉडल अपनाने का संकेत दिया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस पहुँच को सुरक्षित रखने के लिये दोनों देशों के बीच डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और उपयोग नीतियों पर पारस्परिक समझौता होगा, जिससे अनुचित प्रतिबंध या तकनीकी कटौती की संभावना न रहे। पैक्स सिलिसा शिखर सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधियों ने अमेरिकी पक्ष के इस आश्वासन को स्वागत किया और कहा कि इस कदम से भारतीय स्टार्ट‑अप्स, शोध संस्थानों और सार्वजनिक‑निजी साझेदारियों को एआई के अग्रणी मॉडल्स, जैसे कि एंथ्रोपिक और ओपनएआई के नवीनतम संस्करणों, तक स्थिर पहुँच मिल सकेगी। इससे न केवल नवाचार को गति मिलेगी, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और विनिर्माण जैसे मुख्य क्षेत्रों में भी एआई-आधारित समाधान को शीघ्रता से लागू किया जा सकेगा। भारतीय इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने इस बात पर बल दिया कि स्थायी तकनीकी पहुँच देश की डिजिटल सशक्तिकरण योजना के साथ संरेखित है और भविष्य में विश्व स्तर के एआई प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक निभाने में सहायक होगी। निष्कर्षतः, अमेरिका द्वारा दिया गया स्थायी एआई एक्सेस का आश्वासन भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को और सुदृढ़ करता है। इस सहयोग से दोनो देशों के बीच विश्वास का पुल मजबूत होगा और वैश्विक एआई इकोसिस्टम में भारत की भूमिका और भी प्रमुख हो जाएगी। इस दिशा में आगे भी नीति‑निर्माताओं को उचित नियामक ढाँचे, बौद्धिक संपदा के संरक्षण और डेटा सुरक्षा के उच्च मानकों को लागू करना आवश्यक है, ताकि इस साझेदारी से उत्पन्न लाभ व्यापक और सतत रूप से प्राप्त हो सके।