आज विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि पासपोर्ट किसी व्यक्ति की नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वह केवल एक अंतरराष्ट्रीय यात्रा प्रमाणपत्र है। यह बयान कई समाचार संगठनों में प्रकाशित हुए विभिन्न रिपोर्टों के बाद आया है, जिन्होंने इस मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा का विषय बना दिया था। अधिकारी का कहना है कि पासपोर्ट का मूल उद्देश्य व्यक्ति को विदेश यात्रा के लिए वैध पहचान देना है, न कि उसकी राष्ट्रीयता की पुष्टि करना। इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि भारत में नागरिकता का प्रमाण पत्र, आधार कार्ड या मतदान अधिकारी पहचान पत्र जैसी औपचारिक दस्तावेज़ ही असली नागरिकता का प्रमाण बनते हैं। वास्तव में, पासपोर्ट का ऐतिहासिक विकास इसे केवल एक यात्रा पत्र के रूप में परिभाषित करता है। इसकी वैधता केवल सीमा पार करते समय पहचान के साधन के रूप में होती है, जबकि नागरिकता का निर्धारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5, 6 और 7 के तहत किया जाता है। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया में आवेदक की नागरिकता की पुष्टि पहले से ही दस्तावेज़ों के माध्यम से की जा चुकी होती है, परन्तु पासपोर्ट स्वयं वह दस्तावेज़ नहीं है जो किसी की राष्ट्रीयता को सिद्ध करे। देश भर में एक दिन पासपोर्ट सेवा दिवस के रूप में मनाया गया, जिसके दौरान पासपोर्ट जारी करने की सुविधा में सुधार और नई तकनीकी उपायों को अपनाने की घोषणा की गई। इस अवसर पर कई नागरिकों ने प्रश्न उठाए कि यदि पासपोर्ट नागरिकता नहीं है तो विदेश में प्रवास, कार्य व शिक्षा हेतु किन दस्तावेज़ों की आवश्यकता होगी। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि विदेश में प्रवेश करने के लिए मूल रूप से गंतव्य देश की वीज़ा नीति लागू होती है, जबकि भारत में रहने वाले नागरिकों को अपना पासपोर्ट व अन्य पहचान पत्र दोनों रखना अनिवार्य है। निष्कर्ष स्वरूप, वरिष्ठ अधिकारी का यह बयान यह समझाने के लिए जरूरी था कि पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। भारतीय नागरिकों को चाहिए कि वे अपने मूल पहचान दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखें और पासपोर्ट को केवल अंतरराष्ट्रीय यात्रा की सुविधा के रूप में देखें। इस स्पष्टता से भविष्य में पासपोर्ट से जुड़े किसी भी प्रकार के कानूनी भ्रम या गलतफहमी को समाप्त करने में मदद मिलेगी और नागरिकों का भरोसा भी बढ़ेगा।