संयुक्त राज्य के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इरानी परमाणु समझौते को लेकर तीखा बयान दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर उन्हें यह समझौता पसंद नहीं आया तो देश "फिर से गोलाबारी" की ओर लौटेगा। यह टिप्पणी गुट-एक्स (G7) शिखर सम्मेलन के अंतिम दिन सामने आई, जब विश्व के मुख्य नेताओं ने इरान और संयुक्त राज्य के बीच संभावित समझौते को लेकर चर्चा की। ट्रम्प की इस टिप्पणी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर असंतोष और जिज्ञासा दोनों को बढ़ा दिया, क्योंकि उनका वक्तव्य अपेक्षित कूटनीतिक संवाद के विपरीत एक कड़ा सैन्य संकेत पेश करता है। ट्रम्प ने यह बयान एक इंटरव्यू में दिया, जिसमें उन्होंने कहा, "अगर हमें यह समझौता पसंद नहीं है, तो हम फिर से गोलीबारी पर लौट आएँगे।" इस पर कई विशेषज्ञों ने इरान के साथ वार्ता में कठोर रुख अपनाने की संभावना का इशारा किया और इस बात को स्पष्ट किया कि अमेरिकी विदेश नीति में परिवर्तन का संकेत यह हो सकता है। दूसरी ओर, इरान के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाना चाहते और इस समझौते को "साफ़ और स्पष्ट" कहा। उन्होंने कहा कि इरान निरंतर अंतरराष्ट्रीय नज़रियों में भरोसा रखेगा और शांति के रास्ते पर आगे बढ़ेगा। गुट-एक्स के नेताओं ने इस स्थिति पर एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने लिबान में त्वरित युद्धविराम की मांग की और यूएस-ईरान समझौते को सुरक्षित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का आह्वान किया। यह बयान सभी पक्षों के बीच तनाव को घटाने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने का प्रयत्न दर्शाता है। हालांकि, ट्रम्प की उग्र टिप्पणी ने इस प्रयास को कमजोर करने की सम्भावना दिखाई, क्योंकि यह अमेरिकी सार्वजनिक राय में पुनः सैन्य विकल्पों के समर्थन को बढ़ावा दे सकती है। अंत में यह कहा जा सकता है कि ट्रम्प का बयान न केवल अमेरिकी विदेश नीति को पुनः आकार दे सकता है, बल्कि मध्य पूर्वीय सुरक्षा परिदृश्य में भी बदलाव ला सकता है। यदि यह रुख आगे भी जारी रहता है, तो इरान के साथ वार्ता में नई कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं और क्षेत्रीय तनाव में वृद्धि हो सकती है। परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि अंततः कूटनीति ही इस मुद्दे को सुलझाने का सबसे प्रभावी तरीका रहेगा, क्योंकि दोनों पक्षों को आर्थिक और रणनीतिक लाभ के लिए वार्ता जारी रखने की आवश्यकता है।