कुल मिलाकर राजनीतिक जगत में अभी कई दिनों से ‘ऑपरेशन टाइगर’ की खबरा च चल रही हैं। महाराष्ट्र की शिव सेना (उभय बहुतेर) की एक अभ्यंतरी ने दलील की है कि पार्टी के नजदीकी सांसदों को 50 करोड़ रुपये का क्यूपन पेश किया गया था, जिससे वे पार्टी से हटकर अपना रास्ता बना सकें। यह दावा इस सप्ताह के विभिन्न समाचार स्रोतों में उभर कर सामने आया, जबकि इन सांसदों के वास्तविक ठिकाने, और इस प्रस्ताव को कब और किसने पेश किया, इस बात पर अभी तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई है। इस विवाद की जड़ें तब गहरी हुई जब दिल्ली में दो मुख्य सांसद, ईकनाथ शिंदे और शृंकंते शिंदे, ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा के बीच दिखाई दिए। दोनों ही शिव सेना (उभय बहुतेर) के प्रमुख प्रतिनिधि हैं और उनके इस दौर में उपस्थित होना कई लोगों के लिये आश्चर्यचकित कर देने वाला था। वहीं पार्टी के मौजूद मेहमान ने कैमरा के सामने इन सांसदों को निशाना बनाते हुए कहा कि यह प्रस्ताव ‘भ्रष्टाचार की एक नई परत’ है, और इससे पार्टी के अंदरूनी ढाँचों में अराजकता फूट रही है। ये आरोप बहुतेर मोर्चे के भीतर आपसी मतभेद को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। उभय बहुतेर के वरिष्ठ नेता संजय रावत ने भी इस मुद्दे को सार्वजनिक मंच पर उठाया। उन्होंने कहा, “जिन सांसदों को 50 करोड़ रुपये का प्रस्ताव मिला, वह अभी तक पार्टी के भीतर कहीं भी नहीं पहुँचा, और हमें नहीं पता कि उनका पता क्या है। यह एक राक्षसी प्रस्ताव है, जिसपर हमें सतर्क रहना होगा।” उन्होंने दृढ़ता से कहा कि इस प्रकार के किसी भी प्रस्ताव को ‘बिप’ या ‘बीप’ न करने को पार्टी का सिद्धांत माना जाएगा, और ऐसे राजनैतिक खेल के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी। इन सभी घटनाओं को देखते हुए, कई उभय बहुतेर के समर्थकों ने इस घोटाले को ‘त्रिनामूल’ की चाल मानते हुए शंका जताई है। ट्राइबनोल्वो संगीत सजीव रूप से इस गड़बड़ी को उजागर कर रहा है, जहाँ रावत ने कहा कि 50 करोड़ के प्रस्ताव का लक्ष्य पार्टी को तोड़ फोड़ करके विपक्षी दलों के पक्ष में मोड़ना है। साथ ही, तीन उधव समर्थक सांसद ने लोकसभा के अध्यक्ष बिर्ला के पास अपील की है, यह बताने के लिये कि वे पार्टी के पुनर्गठन के विरोध में नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की तलाश में आए हैं। निष्कर्षतः, ‘ऑपरेशन टाइगर’ के दावे के पीछे वास्तविकता क्या है, यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है, परन्तु यह स्पष्ट है कि शिव सेना (उभय बहुतेर) के भीतर गहरी सत्ता संघर्ष की सूरत उभरी है। पार्टी के भीतर के कई नेता अब इस घोटाले को साफ़ करने के लिये एकजुट हो रहे हैं, जबकि कुछ संदेहजनक राजनैतिक ताकतें इस स्थिति का फ़ायदा उठाने के लिये तैयार दिख रही हैं। आगे क्या होगा, यह देखना बचेगा, परन्तु इस प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोपों को निरस्त करने के लिये साक्ष्य और पारदर्शी जांच की आवश्यकता स्पष्ट है।