एक युवा नेत्रा (NEET) अभ्यर्थी की आत्महत्या ने देशभर में शिक्षा प्रणाली की बुनियादी खामियों को फिर से उजागर कर दिया है। नेत्रा की मौत के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत के प्रधानमंत्री पर तीखा प्रहार किया, कहा कि "पिछले बारह वर्षों से हमारे शैक्षणिक ढांचे को बुरी तरह बर्बाद किया गया है"। यह घटना केवल अकेली नहीं, बल्कि देश में इस साल पाँचवीं बार की आत्महत्या है, जिससे छात्रों में निराशा और तनाव की सीमा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। नेत्रा जैसी कच्ची प्रतिभा को शिक्षा के अभेद्य सागर में डूबते देख, नीति निर्माताओं पर सवाल उठते हैं कि क्या वे वास्तव में छात्रों की वास्तविक जरूरतों को समझते हैं या केवल अंक-आधारित प्रतिस्पर्धा को ही प्राथमिकता देते हैं। नेत्रा की आत्महत्या के पीछे का मुख्य कारण था NEET परीक्षा में पेपर लीक होने का झूठा भरोसा, जिससे कई अभ्यर्थी दीवाने हो गए। इस तनावपूर्ण माहौल में जब परीक्षा का पुनः निर्माण नहीं हो रहा था, तो युवक ने अंततः अपना जीवन समाप्त कर दिया। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक सामाजिक रोग है। शिक्षा के इस जाल में छात्रों को असहाय महसूस कराना, अधिक दबाव डालना, और उन्हें पुनः परीक्षा देने का साहस न होना, सभी मिलकर इस प्रणाली को खतरनाक बना रहे हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार, इस साल राष्ट्र में कम से कम पाँच ऐसे मामलों की पुष्टि हुई है, जहाँ विद्यार्थियों ने परीक्षा के बोझ से बच पाने के लिए जीवन त्याग दिया। राहुल गांधी ने इस घटनाक्रम को एक महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में पेश किया, कहा कि "हमारा शिक्षा तंत्र अब किसी भी मानव के मस्तिष्क को तोड़ने से नहीं रोक पा रहा है"। उन्होंने प्रधानमंत्री को तत्काल कदम उठाने का आव्हान किया, ताकि छात्रों को मार्गदर्शन, मनोवैज्ञानिक सहायता और उचित परीक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जा सके। शिक्षा मंत्रालय को अब सख्त नियम बनाकर परीक्षा सुरक्षा को सुदृढ़ करना होगा, साथ ही छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रावधान करने चाहिए। इस दिशा में सरकार को न केवल शैक्षिक संस्थानों की निगरानी करनी होगी, बल्कि छात्र कल्याण केंद्र, काउंसलिंग सेवाएं और सहायता समूह स्थापित करने पर भी ध्यान देना चाहिए। समाज के सभी वर्गों को मिलकर इस शिक्षा संकट से मुकाबला करना होगा। अभिभावक, शिक्षक, नीति निर्माता और छात्र स्वयं को इस बात का एहसास होना चाहिए कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी लगना नहीं, बल्कि व्यक्ति को संपूर्ण विकास की दिशा में ले जाना है। जब तक छात्रों को निरंतर दबाव, अनिश्चितता और असहायता का सामना नहीं करना पड़ेगा, तब तक हमारी राष्ट्रीय प्रगति अधूरी रहेगी। नेत्रा की दुखद कहानी को याद रखकर हमें एक सच्ची, सक्षम और मानवता-उन्मुख शिक्षा प्रणाली की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।