देहरादून के एक छोटे कस्बे में दो जुड़वाँ बच्चों के जन्म के बाद एक महिला को अपने सास-ससुर ने बाथरूम में बंद कर रखा और लगभग दस महीने तक उसके साथ अमानवीय अत्याचार किए। यह रहस्यमय घटना स्थानीय लोगों को चकित कर रही है और सामाजिक मंचों पर गरमागरम बहस का कारण बन गई है। घटना का प्रारंभिक बिंदु तब था जब नवजात बच्चों की देखभाल में सास-ससुर ने अपनी बहु को झूठी शिकायतें उठाई और उसे बाथरूम के संकीर्ण कोने में बंद कर दिया। वह दिन-रात इस छोटे से टॉयलेट में रहना मजबूर हुई, जहाँ उसे केवल कच्चा चावल और कड़ी मेहनत के साथ ही खाना मिलता था। सास-ससुर की यह बेतुकी साजिश न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक शोषण का भी उदाहरण थी। स्थानीय पुलिस के अनुसार, पत्नी को बाथरूम में रहने के दौरान कई बार मारपीट और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। बाथरूम में सीमित प्रकाश, खराब हवादारी और कचरे के ढेर से उसकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती रही। बच्चे भी इस अत्याचार के बीच में ही बड़े हुए, जबकि माँ अपने बंधन में सदीयों तक बंदी थी। कई पड़ोसियों ने इस नरक जैसा माहौल देख कर चुप नहीं रहे और तुरंत पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करवाने का आग्रह किया। पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज किया और ससुराल वालों को जेल भेज दिया। जांच में यह तथ्य सामने आया कि सास-ससुर ने महिला को बाथरूम में रखने का कारण यह दूषित करना था कि वह परिवार की आर्थिक स्थिति को बिगाड़ रही थी और बच्चों की देखभाल में कोई मदद नहीं कर रही थी। कई दस्तावेज़ और चिकित्सकीय रिपोर्टें यह साबित करती हैं कि महिला को लगातार कच्चा चावल खिलाया गया और बहुत कम पानी दिया गया, जिससे उसकी शारीरिक क्षति स्पष्ट थी। अंत में, न्यायालय ने सास-ससुर को कठोर सजा सुनाई और महिलাকে सुरक्षा उपायों के तहत रखवाली के साथ घर वापसी की अनुमति दी। यह घटना सामाजिक मनोविज्ञान में गहरी जाँच का विषय बन गई है। कई सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार संगठनों ने इस मामले को महिलाओं के खिलाफ हो रहे हिंसा के गंभीर उदाहरण के रूप में उजागर किया है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि ऐसे मामलों के प्रति सख्त क़ानून बनाये जाएँ और शैक्षणिक व सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं, जिससे ऐसी अनैतिक प्रथाएं संपूर्ण समाज में समाप्त हो सकें।