कोलकत्ता के सड़कों पर एक नया इतिहास रचा गया जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तथा तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने पुलिस की प्रतिरोध के बावजूद अपने समर्थनकर्ताओं के साथ धरना लगाया। उनका उद्देश्य बीजपी द्वारा १७७ निर्वाचन क्षेत्रों में गिनती में हुई गड़बड़ी को उजागर करना और "पोस्ट‑पोल हिंसा" के खिलाफ आवाज़ उठाना था। इस धरने में केवल छह अनुशासनहीन विधायक और तीन सांसद ही उपस्थित थे, परंतु उनका दृढ़ संकल्प और बयान देश भर में चर्चा का कारण बना। बनर्जी ने कहा कि अगर इस चुनावी प्रक्रिया को ठीक नहीं किया गया तो यह "करो या मरो" का संघर्ष बन जाएगा। भारी भीड़ के सामने बनर्जी ने खुलकर कहा कि बीजेपी ने गिनती में युक्तिसंगत त्रुटियों को छुपाने के लिए गड़बड़ी की, जिससे तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मतों की गिनती में बाधा आई। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक स्थानीय मामला नहीं है, बल्कि देशव्यापी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये खतरा है। इस बीच पुलिस ने कई बार घेराबंदी और क़ाबू में रखने की कोशिश की, परन्तु बनर्जी ने संकल्पित रहकर द्वारों को खुले रखा और शांति पूर्ण तरीके से धरना जारी रखा। इस समय कई प्रमुख विपक्षी नेताओं ने इस आंदोलन को समर्थन दे कर कहा कि यह लड़ाई केवल पश्चिम बंगाल की नहीं बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की है। बाजार में मतभेद के बावजूद इस धरने ने कई सवाल उठाए। पहली बात यह कि चुनाव आयोग के पास इस गड़बड़ी की जांच शुरू करने का क्या कदम है? दूसरी बात यह कि पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने के लिये कौन-से वैधानिक उपाय किए जा सकते हैं? इस बीच बीजपी ने अपने मंत्रियों से कहा कि इस मुद्दे को उलझाने में उनके पास पर्याप्त सबूत हैं और वह जल्द ही न्यायालय में इस पर कार्रवाई करेंगे। लेकिन विरोधी दल ने कहा कि इन सबूतों को छुपाने के लिये जेबीपी ने कई रचनात्मक उपाय अपनाए हैं। भविष्य की दृष्टि में, ममता बनर्जी ने कहा कि अगर सभी प्रयासों के बाद भी सरकार और चुनाव आयोग उचित कदम नहीं उठाते हैं तो वह पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर आंदोलन का आह्वान करेंगे। उनका लक्ष्य है कि सभी प्रतिस्पर्धी दलों को समान मैदान पर प्रतिस्पर्धा का अवसर मिले और लोकतंत्र की आत्मा को बचाया जा सके। इस धरने के बाद कई शहरों में समान विरोध प्रदर्शन की आवाज़ें तेज हो रही हैं, जिसमें यह स्पष्ट है कि जनता अब केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस कार्यों से न्याय की उम्मीद रखती है। अंत में, यह घटना इस बात का प्रमाण है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी को जनता की सतर्क आंखें भुला नहीं सकतीं।