सीबीएसई ने हाल ही में अपनी नई रणनीति के तहत स्कूल मुख्याध्यापकों को अपने आधिकारिक प्रसार का मुख्य साधन बना लिया है। पहले जहाँ बोर्ड के अपने कर्मचारियों और संवाद माध्यमों पर निर्भर था, अब वह हर स्कूल के प्रमुख को अपने संदेशों, घोषणाओं और नीति बदलावों को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के लिये एक विस्तृत मार्गदर्शिका प्रदान कर रहा है। इस कदम का उद्देश्य शिक्षकों और अभिभावकों तक तेज़ी से जानकारी पहुँचाना और बोर्ड की छवि को डिजिटल मंचों पर सुदृढ़ बनाना बताया गया है। मुख्याध्यापकों को आधिकारिक खातों के लिंक, पोस्ट के रूपरेखा और बॉर्डर के प्रतिनिधियों से नियमित संपर्क के लिये निर्देश दिए जा रहे हैं, जिससे प्रत्येक विद्यालय अपनी प्रोफ़ाइल के माध्यम से सीबीएसई की घोषणाएँ साझा कर सके। इस पहल को आलोचक ‘प्रचार इकाई’ का टैग दे रहे हैं, पर बोर्ड का कहना है कि यह आधुनिक युग में पारदर्शिता और त्वरित संचार की आवश्यकता को पूरा करता है। समाचार में बताया गया है कि सीबीएसई ने मुख्याध्यापकों को विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर इंस्टेंट मैसेज, वीडियो और ग्राफ़िक पोस्ट बनाने के लिये प्रशिक्षण सत्र भी आयोजित किए हैं। इन सत्रों में डिज़िटल मार्केटिंग के मूल सिद्धांत, सही हैशटैग का उपयोग और गिरावट से बचने के उपायों को विशेष रूप से उजागर किया गया। साथ ही, प्रत्येक पोस्ट की निगरानी के लिये एक केंद्रीकृत मॉनिटरिंग टीम स्थापित की गई है, जो किसी भी अनुचित सामग्री या गलत सूचना को तुरंत हटाने का काम करती है। इस प्रक्रिया के तहत मुख्याध्यापकों को सामुदायिक प्रश्नों के उत्तर देने और अभिभावकों की चिंताओं को सार्वजनिक रूप से सुलझाने की भी अपेक्षा रखी गई है, जिससे शैक्षणिक प्रक्रियाओं में विश्वास का निर्माण हो सके। इन उपायों के बावजूद, इस कदम पर कई विशेषज्ञों और शैक्षणिक विश्लेषकों ने प्रश्न उठाए हैं। उनका मानना है कि मुख्याध्यापक का प्राथमिक कार्य शैक्षणिक प्रबंधन है, जबकि सामाजिक मीडिया का प्रबंधन अतिरिक्त बोझ बन सकता है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि उचित नियंत्रण नहीं रहे तो गलत जानकारी का प्रसार, राजनीति का दखल और व्यक्तिगत विवाद भी सामाजिक मंचों पर उभर सकते हैं। इसके अलावा, सीबीएसई द्वारा अभी तक मुख्याध्यापकों को मिलने वाले वेतन या प्रेरणा पैकेज के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है, जिससे इस पहल की सततता पर संदेह बना हुआ है। अंत में कहा जा सकता है कि सीबीएसई का यह कदम तकनीकी परिवर्तन के साथ तालमेल बिठाने की दिशा में एक साहसिक प्रयास है, परन्तु इसे सफलता प्राप्त करने के लिये स्पष्ट दिशानिर्देश, निगरानी तंत्र और मुख्याध्यापकों के कार्यभार को संतुलित करना आवश्यक है। यदि यह पहल उचित प्रबंधन के साथ लागू हो तो यह छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच संचार को और अधिक सुदृढ़ बना सकती है, और बोर्ड की डिजिटल पहचान को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती है। अन्यथा, यह कार्यभार वृद्धि और सूचना बिखराव का कारण बनकर शैक्षणिक प्रणाली में नई चुनौतियों को जन्म दे सकता है।