नेपाल के प्रधान मंत्री बलेन्द्र शाह ने हाल ही में एक तीव्र दावा किया है कि नेपाल और भारत दोनों ही एक दूसरे के दायरे में अतिचालन कर रहे हैं। यह बयान काठमांडू में एक सार्वजनिक सभा में दिया गया, जहाँ उन्होंने कहा कि भारत ने नेपाल के कुछ पड़ोसी गांवों की भूमि पर कब्ज़ा कर लिया है, जबकि भारत के विदेश मंत्रालय ने उत्तर में वही आरोप लगाया कि नेपाल ने भी कुछ भारतीय इलाकों में सीमा रेखा से बाहर विस्तार किया है। इस सिलसिले में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का नया अध्याय खुल गया है, जिससे दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक तनाव में बढ़ोतरी देखी जा रही है। प्रधानमंत्री शाह ने इस मुद्दे को लेकर भारत को मध्यस्थता के रूप में संयुक्त राष्ट्र या यूके जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद लेने की बात भी कही है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच इतिहास में कई बार सीमा रेखा बदलते रहे हैं, लेकिन आज के समय में स्पष्ट नक्शा और मान्य सीमा का अभाव ही इस तरह के विवादों की जड़ है। काठमांडू के निकट मौजूद कई सीमावर्ती गाँवों में दो देशों के लोगों के बीच व्यापार और सामाजिक संबंध गहरे हैं, परन्तु औपचारिक मानचित्र में इन क्षेत्रों को सही तरह से चिन्हित नहीं किया गया है, जिससे उत्तर-गलतफहमी और विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। भारत ने इस बात को नकारते हुए कहा है कि नेपाल की ओर से प्रस्तुत किए गए प्रमाण अधूरे और अप्रमाणिक हैं। न्यू दिल्ली के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने कभी भी नेपाली-भारतीय सीमा के भीतर अनधिकृत रूप से कोई भी कदम नहीं उठाया है और यह पूरे तथ्य ही नहीं है कि नेपाल ने भारतीय जमीन पर अतिचालन किया है। इसके अलावा, भारत ने सत्रह वर्ष पहले 2015 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय समझौते के संदर्भ में कहा कि किसी भी सीमा परिवर्तन के लिए दोनों देशों की समान सहमति आवश्यक होगी। इन अधिकृत बयानों के बीच, कूटनीतिक संवाद की संभावना भी बनी हुई है। दोनों देशों के बीच सीमा संबंधी मुद्दे पर चर्चा करने के लिए एक विशेष कार्यसमिति गठित करने की मांग कई विशेषज्ञों ने की है। अगर इस प्रकार का मंच स्थापित किया जाता है, तो सीमा पर मौजूद स्थानीय लोगों की समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है और दायरे में आए किसी भी विसंगति को ठीक करने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया लागू की जा सकती है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की भूमिका को लेकर भी विचार किया जा रहा है, जिससे निष्पक्ष समाधान मिलने की संभावना बढ़ेगी। निष्कर्षतः, नेपाल-भारत सीमा विवाद ने फिर एक नई जटिल स्थिति को जन्म दिया है जहाँ दोनों पक्षों के बीच ऐतिहासिक, सामाजिक और भौगोलिक कारक एक साथ मिलकर तनाव को बढ़ा रहे हैं। इस स्थिति में अगर दोनों देशों के बीच पारदर्शी संवाद, तथ्य-आधारित जांच और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाया जाए, तो शायद भविष्य में इस तरह के अतिचालन के आरोप कम हो सकते हैं और संतुलित रिश्ते की पुनर्स्थापना संभव हो सकेगी।