राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत आयोजित सीबीएसई ओपन स्केलिंग मेथड (OSM) परीक्षा के उत्तर पत्रिकाओं को फोन‑स्कैन करके जमा करने के प्रस्ताव पर राहुल गाँधी ने तीखा विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस कदम से परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता तथा छात्रों की परीक्षा की ईमानदारी पर बड़ा सवाल उठता है। OSM परीक्षा के लिये उच्चतम गुणवत्ता वाले स्कैनर और बड़े पैमाने पर फोन‑सोफ्टवेयर की जरूरत पड़ेगी, जिससे सरकारी खर्चे में अनावश्यक वृद्धि होगी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की तकनीकी अड़चनें ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों को असमानता के नए दायरे में धकेल सकती हैं। इस विवाद के केंद्र में सीबीएसई के टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता भी है। टेंडर दस्तावेज़ों में कई अनियमितताओं की रिपोर्टें सामने आई हैं, जिसमें नागपुर विश्वविद्यालय के समान टेंडर रिगिंग के आरोप शामिल हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि टेंडर प्रक्रिया में कुछ कंपनियों को ही प्राथमिकता मिल रही है, जबकि अन्य योग्य कंपनियों को बाहर रखा जा रहा है। राहुल गाँधी ने इस बात को उजागर करते हुए कहा, "बिंदु यह नहीं है कि उत्तर पत्रिकाएँ स्कैन की जाएँ, बल्कि यह है कि किसके पास इस काम को करने का अधिकार हो और क्या वह प्रक्रिया नियामक मानकों के अनुरूप है।" विरोधी दल के प्रवक्ता ने कहा कि सरकार ने इस मुद्दे को हल्के में लिया है और सार्वजनिक साझेदारी की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। उन्होंने सरकार को तुरंत टेंडर प्रक्रिया की पुनः समीक्षा करने, सभी दस्तावेज़ सार्वजनिक करने और उत्तर पत्रिकाओं के वैकल्पिक समाधान—जैसे कागज‑आधारित प्रक्रिया—का उपयोग करने का आह्वान किया। नागरिक समाज की कई संगठनों ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की, जिसमें कहा गया कि शिक्षा क्षेत्र में ऐसी बड़े पैमाने की तकनीकी बदलावों को लागू करने से पहले व्यापक परामर्श और परीक्षण आवश्यक है। इन सबके बीच, केंद्रीय सरकार ने अभी तक इस आरोप पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि, अधिकारी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ओएसएम परीक्षा का उद्देश्य उत्तर पत्रिकाओं की शुद्धता और तेज़ी से परिणाम देना है, और इस दिशा में उठाए गए कदमों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी माना गया है। फिर भी, राहुल गाँधी और कई विपक्षी वर्गों का कहना है कि इस तरह के बड़े बदलावों में जनता की सहभागिता और वित्तीय पारदर्शिता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। निष्कर्षतः, सीबीएसई‑ओएसएम टेंडर और उत्तर पत्रिकाओं की स्कैनिंग प्रक्रिया पर विवाद न केवल शैक्षिक नीति की दिशा को चुनौती दे रहा है, बल्कि सरकारी खर्चों की पारदर्शिता और टेंडर प्रक्रियाओं की निष्पक्षता को भी प्रश्नचिह्न में डाल रहा है। इस मुद्दे पर आगे की जांच और सार्वजनिक चर्चा आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी भी शैक्षिक सुधार को सभी हितधारकों के भरोसे के साथ लागू किया जा सके।