सबसिनियर कॉंग्रेस नेता राहुल गाँधी ने इस हफ्ते शिक्षा मंत्रालय के खिलाफ एक तीव्र बयान दिया, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार को "सोरॉस के एंटी-नेशनल एजेंटों" का सहयोगी कहा। यह टिप्पणी राष्ट्रीय शैक्षणिक बोर्ड (CBSE) द्वारा ओन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) और पुनर्मूल्यांकन (re‑evaluation) के लिए निर्धारित अतिरिक्त शुल्क के विवाद के मद्देनज़र की गई। राहुल ने कहा कि "अगर सरकार को इस विषय में असली राष्ट्रीय हित नहीं है तो वह तो बेमेल "सोरॉस एजेंटों" के साथ मिलकर अपने वैध अधिकारों को धूमिल करने में लगा है"। यह बयान उनके कई दिनों से चल रहे विरोध से जुड़ा है, जब उन्होंने CBSE के निर्णय को "विचारहीन" और "छात्रों व उनके अभिभावकों को आर्थिक बोझ डालने वाला" कहा। उनका मानना है कि OSM और पुनर्मूल्यांकन शुल्क से उन लाखों विद्यार्थियों को असुविधा होगी, जो पहले ही आर्थिक तनाव से जूझ रहे हैं। सीबीएसई ने कहा था कि नए ओन‑स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के तहत परीक्षा के उत्तरपत्रों को डिजिटल रूप में पढ़ने के लिए विशेष सॉफ़्टवेयर का उपयोग किया जाएगा, और इसकी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिये स्कैनिंग फीचर को शामिल किया गया है। हालांकि, परीक्षा बोर्ड ने पुनर्मूल्यांकन के लिए प्रति छात्र लगभग दो सौ रुपए का शुल्क निर्धारित किया। इस फैसले पर कई राज्य और निजी शैक्षणिक संस्थानों ने विरोध जताया, क्योंकि इससे छात्रों की सुविधा के साथ-साथ उनके भविष्य की शैक्षणिक प्रगति भी प्रभावित हो सकती है। इस मुद्दे पर राहुल ने दो प्रमुख बिंदुओं को उजागर किया—पहला, "फोन‑स्कैन्ड" उत्तरपत्रों का उपयोग जो गोपनीयता की चिंताओं को जन्म देता है, और दूसरा, मूल्य पुनर्मूल्यांकन का उच्च शुल्क जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए असमानता को बढ़ावा देता है। राहुल ने कहा, "जब सरकार बच्चों की शिक्षा को लेकर बोझ उठाने की बात कर रही है, तो वह खुद को बेटा-भतीजे तक सीमित कर देती है, और बड़ी सोसाइटी के लिये बहाने बनाती है"। उन्होंने टीमें को भी चेतावनी दी कि "पिकपॉकेट” जैसी धौंस से शिक्षा के क्षेत्र में धोखा नहीं दिया जा सकता। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस टिप्पणी पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी, परंतु उन्होंने कहा कि OSM प्रणाली को लागू करने का मकसद परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ाना है। उन्होंने यह भी कहा कि मूल्य पुनर्मूल्यांकन का शुल्क प्रशासनिक खर्च को कवर करने के लिये उठाया गया है, और इसे छात्रों को अतिरिक्त बोझ नहीं बनना चाहिए, इस हेतु सरकार जल्द ही विचार करेगी। अंत में, राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए कहा कि "यदि सरकार 18.5 लाख छात्रों की बुनियादी शिक्षा में रुचि नहीं रखती, तो वह किसी भी आर्थिक दबाव को बर्दाश्त नहीं कर सकती"। उन्होंने उम्मीद जताई कि जनता इस मुद्दे पर खड़े होकर सरकार पर दबाव बनाएगी, ताकि शिक्षा नीति में सुधार हो और सभी विद्यार्थियों को समान अवसर मिल सके। इस प्रकार, राहुल का यह बयान न सिर्फ CBSE के मूल्य पुनर्मूल्यांकन पर सवाल उठाता है, बल्कि शिक्षा के प्रति सरकारी दृष्टिकोण पर भी गंभीर जांच की पुकार करता है।