देश के जल संसाधन विवादों की जड़ों में फँसा मेकेदातु बांध परियोजना फिर से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का बिंदु बन गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री वी. के. विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे खुले पत्र में कारणाटकों के इस जल संग्रहण परियोजना को तुरंत रोकने की मांग की है, यह कहते हुए कि यह परियोजना स्पष्ट रूप से जल संसाधन अधिकारों का उल्लंघन करती है। पत्र में उन्होंने कहा कि मेकेदातु बांध कर्नाटक राज्य के जल को टेम्परहीन रूप से तमिलनाडु की आवश्यकताओं से वंचित करेगा, जिससे दोनों राज्यों के बीच जल संकट और भी बढ़ जाएगा। इस विवाद की जड़ें 2015 में शुरू हुई जब कर्नाटक ने अपने प्रमुख नदियों में से कुरावी नदी पर बांध निर्माण की योजना बनायी, जिसे बाद में मेकेदातु नाम दिया गया। तमिलनाडु ने इस परियोजना के खिलाफ कई बार कानूनी कदम उठाए, लेकिन अब मुख्यमंत्री विजय ने इस मुद्दे को फिर से उच्चतम स्तर पर ले जाने का निर्णय लिया है। विजयन ने अपने पत्र में कहा कि कर्नाटक की मेकेदातु परियोजना न केवल पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन करती है, बल्कि जल अधिकार अधिनियम 2012 के अनुच्छेद 3 के तहत भी त्याग किया गया है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस बांध के निर्माण से कर्नाटक में बाढ़ की संभावना बढ़ेगी और तमिलनाडु के जल आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि कर्नाटक सरकार ने इस परियोजना के लिये पर्यावरणीय मंजूरी के बाद भी आवश्यक जल उपयोग अधिकार (वाटर यूज राइट) को नहीं प्राप्त किया है, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह एक 'कॉपीराइट लापरवाही' है। इस कारण, मुख्यमंत्री ने इसे 'स्पष्ट उल्लंघन' कहा और तत्काल रोक की मांग की। इस पत्र के बाद तमिलनाडु सरकार ने संबंधित सरकारी विभागों को आदेश दिया है कि वे इस मुद्दे पर सभी उपलब्ध कानूनी साधनों को उपयोग में लाएँ। उन्होंने कर्नाटक के साथ चल रहे जल‑विवाद को हल करने के लिये उच्च न्यायालय में दाखिल की गयी याचिकाओं को और तेज़ी से निपटाने का निर्देश भी दिया। तमिलनाडु के कांग्रेस नेता टैगोर ने भी इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि डेम परियोजना के पीछे राजनीति की चाल चल रहे हैं और यह नवाजियों के लिए 'सस्ते राजनीति' का मामला है। राष्ट्रीय स्तर पर भी यह मुद्दा कई राजनयिक चर्चाओं का विषय बन चुका है, और विशेषज्ञों का कहना है कि जल संसाधनों का न्यायसंगत बंटवारा ही भविष्य की स्थिरता का मूल सिद्धांत होना चाहिए। आखिरकार, प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया अभी भी अनिश्चित है, परंतु जल सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय जल नियमों को ध्यान में रखते हुए, केंद्र सरकार को इस विवाद में संतुलित भूमिका निभाने की ज़रूरत है। यदि मेकेदातु बांध को रोक दिया गया तो कर्नाटक को अपनी जल आवश्यकताओं के लिये वैकल्पिक विकल्प तलाशने होंगे, जबकि तमिलनाडु को जल आपूर्ति में स्थिरता का आश्वासन मिलेगा। इस प्रकार, यह पत्र जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और राज्य-राज्य संबंधों के जटिल पारस्परिक समीकरण को नया मोड़ देता है, और भविष्य में जल विवादों के समाधान के लिये एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है।