मध्य प्रदेश के हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण सुनवाई की तैयारी की है, जिसमें तविषा शर्मा के हत्याकाण्ड से जुड़े दहेज के आरोप में सास‑जी Giribala Singh ने कोर्ट को चुनौती दी है। यह मामला देशभर में दहेज प्रथा के उग्र प्रसंग को उजागर करता है और सामाजिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर कई सवाल खड़े करता है। तविषा शर्मा, जो 23 वर्ष की एक युवा महिला थी, को 2022 में अपने ससुराल में पदावधि में दहेज की मांग को लेकर परेशानी के कारण हत्या के रूप में मृत पाया गया। इस घटना ने जनमत में गहरी आहिरा उत्पन्न की और इस पर केंद्र और राज्य स्तर पर कई जांचें शुरू हुईं। अब हाई कोर्ट में सुनवाई का दायरा खुला है, जहाँ सास‑जी Giribala Singh ने दहेज के आरोपों को खारिज करने के लिए कई अपील दायर की हैं। सास‑जी की अपील में मुख्य रूप से दो बिंदुओं को उठाया गया है: पहला, उन्होंने दावा किया है कि तविषा के परिवार ने कोई दहेज की मांग नहीं की थी और न ही कोई लिखित समझौता हुआ था। दूसरी ओर, उन्होंने यह भी कहा है कि पुलिस द्वारा प्रारम्भिक एफआईआर में कई तथ्यों को अनदेखा किया गया और अधूरी जांच के कारण ही मामले को संज्ञान में लाया गया। इस चुनौती के पीछे प्रमुख कारण यह भी है कि निष्कर्ष निकालने से पहले सभी साक्ष्य, गवाहों के बयान और forensic रिपोर्ट को पूर्ण रूप से जांचा जाना चाहिए। इस संबंध में, केंद्रीय जाँच एजेंसी (CBI) ने भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस केस को अपना ले लिया था और नई FIR दर्ज कर जांच को आगे बढ़ा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में विशेष निर्देश जारी करके मीडिया को सावधानी बरतने का कहा है, कि बिना पुष्टि के कोई भी बयान प्रकाशित न किया जाए। इस आदेश के बाद, कई समाचार संस्थाओं ने तविषा शर्मा के केस को लेकर अपनी रिपोर्टें संशोधित की हैं और सभी पक्षों को मौखिक सुनवाई का अवसर देने की बात कही है। इसके अलावा, विभिन्न सामाजिक संगठनों ने दहेज प्रथा के खिलाफ बलपूर्वक आवाज़ उठाई है और कहा है कि इस तरह के अत्याचारों को जड़ से खत्म करने के लिए कड़े कानून और सख्त सजा आवश्यक है। हाई कोर्ट की सुनवाई में यदि सास‑जी की अपील मान्य हुई तो यह दहेज संबंधी मामलों में कानूनी प्रक्रिया को नया दिशा‑निर्देश दे सकता है। वहीं, यदि अदालत उनकी चुनौती को खारिज कर देती है तो यह दहेज निर्मारी के पक्ष में एक बड़ी जीत होगी और संभावित रूप से दहेज से जुड़ी अपराधों में सख्त सजा की संभावना को बढ़ावा देगा। इस बीच, तविषा शर्मा के परिवार ने न्याय के लिए दृढ़ रहना जारी रखा है और अदालत से मांगी है कि सभी प्रमाणों को निष्पक्षता से देखा जाए। समग्र रूप से कहा जाए तो यह मामला न सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी को दर्शाता है, बल्कि दहेज प्रथा की जटिल सामाजिक संरचना को भी उजागर करता है। यह केस कोर्ट को यह अवसर देता है कि वह सामाजिक बुराइयों को दमन करने के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग करे और साथ ही न्याय की भरोसा पुनर्स्थापित करे। हाई कोर्ट की अगली सुनवाई के बाद इस मामले का निर्णायक मोड़ देखना बाकी है, पर यह स्पष्ट है कि तविषा शर्मा की मौत का न्याय तभी पूरी तरह से स्थापित होगा जब सभी पक्षों को उनके अधिकारों के अनुसार सुना और साक्ष्य के आधार पर न्याय दिया जाए।