भोजपुरी साँभालने वाले अँधेरे में एक और दुखद कहानी ने फिर से सनसनीखेज़ ढंग से सिर पकड़ ली है। 12 दिनों से भी अधिक समय पहले, युवा छात्रा ट्विशा शर्मा को दहेज के झंझट में मारकर मार डाला गया था और उसके बाद दो बार ऑटोप्सी करवाई गई। अब इस मामले का अगला चरण पूर्ण हो गया — उसके शेष शरीर को भोपलों के शहिदा निहितक में दाह संस्कार करके जलाया गया। यह घटनाक्रम न केवल दहेज प्रथा की क्रूरता को उजागर करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में विलंब और सामाजिक सरोकारों की गंभीर कमी को भी रेखांकित करता है। ट्विशा शर्मा का निधन 12 दिन पहले ही हुआ था, जब वह अपने परिवार के साथ दहेज के आरोपों के बीच फंस गई थी। प्रारम्भिक जांच में संकेत मिलता था कि उसे शारीरिक अत्याचार और संभावित हत्या के रूप में मार दिया गया था। इस सिलसिले में पुलिस ने प्रथम ऑटोप्सी की रिपोर्ट तैयार की, लेकिन परिवार ने इसे असंतोषजनक माना और दूसरी ऑटो‑प्सी की मांग की। राज्य की उच्च न्यायालय ने इस मांग को मानते हुए दूसरी ऑटोप्सी का आदेश दिया, जिससे टेम्प्लेट में नए साक्ष्य सामने आए। दोनों रिपोर्टों के बीच कई विसंगतियां पाई गईं, जिसमें मौज़ूद औषधियों और चोटों के प्रकार में अंतर दिखाया गया। दूसरी ऑटोप्सी के बाद, ट्विशा के परिवार ने न्याय की उम्मीद में उच्च न्यायालय में अपील दायर की, जिसमें प्रतिवादी (पती) को तुरंत हिरासत में रखने की मांग की गई। अदालत ने अंततः प्रतिवादी को अनपेक्षित गिरफ़तारी का आदेश दिया और उसे बंधक बनाते हुए प्रतिवादी के वकीलों की बरी करने की याचिका को अस्वीकार किया। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को स्वयं मिलने वाले सूचनात्मक नोटिस के साथ अधिनियमित किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि दहेज के कारण हुई इस हत्या को राष्ट्रीय स्तर पर भी सिद्धांतात्मक रूप से देखा जा रहा है। जैसे ही न्यायिक प्रक्रिया का प्रवाह तेज़ हो रहा था, ट्विशा के अंतिम संस्कार का कार्य भी अनिवार्य रूप से किया गया। 12 दिन के अंतराल के बाद, द्वीप लािसर्ग पवित्तर धूम्र ध्वनि के साथ उसका अंत्यसंस्कार बायोलॉजिकल स्लाइडिंग में किया गया, जहाँ उपस्थित सभी लोगों ने गहरी शोक-संकल्पना दिखाई। निर्मल जल के किनारे पर अपनत्व का आश्रय मिला, परंतु वह छाँव नहीं बना सका; उसके परिवार पर इस नुकसान की पीड़ा अब भी गहरी है। इस मामले की जाँच एवं न्यायिक प्रक्रिया ने समाज में दहेज के खतरों को फिर से उजागर किया है। यह पड़ाव हमें याद दिलाता है कि दहेज न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि सांस्कृतिक बंधनों द्वारा भी इंसान को नष्ट कर सकता है। सरकार को इस दिशा में सख्त कदम उठाते हुए दहेज विरोधी क़ानूनों को कड़ाई से लागू करना चाहिए, साथ ही पीड़ितों के परिवारों को उचित सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। अंत में, ट्विशा शर्मा की करुणा भरी कहानी हमें यह सिखाती है कि सामाजिक बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंकना कितना आवश्यक है, जिससे ऐसी त्रासदियों का अंत हो और प्रत्येक जीव को सुरक्षित जीवन मिल सके।