अमेरिका ने हाल ही में अपने ग्रिन कार्ड (स्थायी निवास) आवेदक प्रक्रिया को कड़ा कर दिया है, जिसका असर सीधे 12 लाख से अधिक भारतीय‑अमेरिकी परिवारों पर पड़ रहा है। पूर्व व्हाइट हाउस सलाहकार के अनुसार, नई नियमावली के तहत उन सभी विदेशी नागरिकों को अपना स्थायी वीज़ा विदेश में ही पूरा करना होगा, जिससे कई भारतीय मूल के परिवारों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। इस परिवर्तन का मुख्य कारण राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रवासी प्रवाह पर नियंत्रण देना बताया जा रहा है, लेकिन इस कदम से कई देर से आए भारतीय कुशल पेशेवरों, छात्रों और उनके परिजनों की जीवनयापना में बड़ा संकट पैदा हो रहा है। नए नियमों के अनुसार, जो लोग पहले H-1B वीज़ा या अन्य अस्थायी वीज़ा पर अमेरिका में काम या पढ़ रहे थे, उन्हें अब ग्रिन कार्ड के लिये विदेश में ही आवेदन करना होगा और अंत में अपने मूल देश में वापस जाकर प्रक्रिया पूरी करनी होगी। यह नीति न केवल कार्यस्थल स्थिरता को खतरे में डालती है, बल्कि कई परिवारों को दोहरी यात्रा, अतिरिक्त खर्च और नौकरी खोने के जोखिम का सामना भी कराती है। एशिया‑पैसिफ़िक क्षेत्र में सबसे अधिक प्रभावित समूह भारतीय मूल के तकनीकी पेशेवर हैं, जो अक्सर अमेरिकी कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत होते हैं। उनके लिए इस नई प्रक्रिया का अर्थ है संदेह, समय-सापेक्ष बाधाएं और आर्थिक तनाव। उसी बखत, यू.एस. कांग्रेस के एक प्रमुख सदस्य, मारको रूबियो ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि "यह केवल भारत के बारे में नहीं है, बल्कि सभी देशों के प्रवासियों के लिए एक अनुचित बाधा है।" उन्होंने इस नीति को आव्रजन प्रणाली के सुधार की दिशा में एक गलत कदम बताया और बताया कि इससे अमेरिकी आर्थिक विकास पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। अमेरिकी मीडिया ने भी इस नई नीति के संभावित प्रभावों को उजागर किया, जिसमें कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि बिना स्पष्ट और लचीले विकल्पों के कई कुशल श्रमिक अमेरिका छोड़ने के बारे में सोच सकते हैं। अंत में, इस नई ग्रिन कार्ड प्रक्रिया का व्यापक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं हो सकता, लेकिन यह स्पष्ट है कि भारतीय‑अमेरिकी समुदाय को अब गहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। कई परिवार अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए वैकल्पिक विकल्प तलाश रहे हैं, जबकि कुछ ने कानूनी सहायता लेने की योजना बनाई है। यह स्थिति अमेरिकी आप्रवासन नीति में एक बड़ा मोड़ दर्शाती है, जहाँ सुरक्षा, आर्थिक विकास और मानवीय अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक हो गया है। यह देखना बाकी है कि आगे सरकार किन संशोधनों या राहत उपायों के साथ इस संकट को कम कर पाएगी और भारतीय प्रवासियों का भरोसा पुनः स्थापित हो सकेगा या नहीं।