सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए NCERT (राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) की पाठ्यपुस्तकों में उपयोग किए जा रहे कार्टून की वैधता पर एक विशेष पेंशनभोगी न्यायाधीशों की समिति को जांच का आदेश दिया है। इस आदेश के पीछे यह सवाल है कि क्या इन कार्टूनों को बच्चों के शैक्षणिक विकास में सकारात्मक प्रभाव मिलता है या ये कुछ सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं के विरुद्ध जा रहे हैं। कोर्ट ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि विभिन्न राज्यों में यह प्रयोग हुआ है कि कुछ शिक्षकों और अभिभावकों ने इन कार्टूनों को असंवेदनशील या अनुचित मानते हुए उन्हें हटाने या बदलने की मांग की थी। इस मुद्दे को उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा के बिना किसी भी पाठ्यक्रम सामग्री को बदलना संविधान के शैक्षिक अधिकारों के विरुद्ध हो सकता है, इसलिए एक स्वतंत्र और अनुभवी पेंशनभोगी जज पैनल को इस पर गहराई से विचार करने का अवसर दिया गया है। समीक्षा समिति के सामने कई प्रमुख बिंदु रखे गये हैं। पहला यह है कि कार्टून का उद्देश्य क्या है—क्या यह केवल पाठ्यपुस्तक को रोचक बनाकर पढ़ाई को आसान बनाता है या यह अनुचित सामाजिक टिप्पणी, लैंगिक या जातीय पक्षपात का स्रोत बन रहा है। दूसरा प्रश्न यह है कि क्या इन कार्टूनों से विद्यार्थियों के मन में किसी प्रकार की पूर्वधारणा या ग़लत सूचना उत्पन्न हो सकती है, जिससे उनके नैतिक विकास पर असर पड़ सकता है। तीसरा बिंदु यह है कि क्या इन चित्रों को हटाने से पाठ्यक्रम की शैक्षणिक प्रभावशीलता में कमी आएगी, क्योंकि कार्टून अक्सर जटिल अवधारणाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करने में मदद करते हैं। इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए समिति को यह भी देखना होगा कि वैकल्पिक सामग्री की उपलब्धता और वह भी छात्रों के लिए समान आकर्षक एवं शिक्षाप्रद हो। NCERT ने इस मामले में अपने पक्ष में कहा है कि कार्टून का चयन विशेषज्ञ टीम द्वारा किया गया था और उनका उद्देश्य छात्रों की सीखने की प्रक्रिया को सहज और रोचक बनाना है। उन्होंने यह भी कहा कि ये चित्र किसी भी सामाजिक, धार्मिक या जातीय समूह को नीचा नहीं दिखाते और उनका कोई भी आपत्तिजनक पहलू नहीं है। इसके अलावा, NCERT ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पाठ्यपुस्तकों का निर्माण वैज्ञानिक तथ्यों और शैक्षणिक मानकों के आधार पर किया गया है, और उनके सभी संलग्न चित्रकों को इस बात की विस्तृत जांच के बाद ही सामग्री में शामिल किया गया था। इस प्रकार, NCERT का यह कहना है कि कार्टून को हटाने या संशोधित करने से न केवल शैक्षणिक सामग्री की समग्रता प्रभावित होगी, बल्कि लंबी अवधि में छात्रों की रचनात्मक सोच और कल्पनाशक्ति को भी नुकसान पहुँच सकता है। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने इस पेंशनभोगी जज पैनल को दो महीने की कार्यावधि निर्धारित की है, जिसमें उन्हें सभी संबंधित पक्षों—शिक्षकों, अभिभावकों, विशेषज्ञों और छात्रों—से सुनवाई कर, विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी होगी। इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत अंतिम निर्णय लेगी कि क्या NCERT पाठ्यपुस्तकों में मौजूद कार्टून को बरकरार रखा जाए, संशोधित किया जाए या पूरी तरह से हटाया जाए। यह निर्णय न केवल भारतीय शैक्षणिक प्रणाली के भविष्य को दिशा देगा, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और शैक्षिक स्वाधीनता के बीच संतुलन बनाये रखने की चुनौती को भी उजागर करेगा।