भारत में इस वर्ष की बरसाती मौसम के लेकर मौसम विज्ञानी उत्साहित हैं, क्योंकि इमीडी के अनुसार दक्षिण-पश्चिमी मानसून जल्दी ही भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश कर चुका है। समुद्र की गर्मी और उत्तरी भारत में उच्च दबाव प्रणाली के विकास से मानसून की बवंडरें मई के शुरुआती दिनों में ही कोसल को धुंध में बदल रही हैं। कई राज्यों में हल्की-फुल्की बौछारें शुरू हो चुकी हैं और जलवायु विभाग ने विभिन्न क्षेत्रों में पीले चेतावनी संकेत जारी कर दिए हैं। विशेषकर केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के तटीय हिस्सों में आज से लेकर अगले कुछ दिनों तक लगातार बारिश की संभावना जताई गई है, जिससे कृषि क्षेत्र में फसल को सिचाई का लाभ मिल सकता है। इस वर्ष के शुरुआती बदलाव से यह स्पष्ट हो रहा है कि साल भर के लिये औसत से अधिक बरसात का अंकड़े तैयार हो रहा है। परंतु इस सकारात्मक शुरुआत के साथ ही एक बड़ा वायुमंडलीय कारक भारत की बरसाती आशाओं को धूमिल कर सकता है। विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि एल नीनो घटना के कारण मौसमी पैटर्न में उतार-चढ़ाव आ सकता है। एल नीनो की शक्ति जब प्रशान्त महासागर के पानी को असामान्य रूप से गर्म करती है, तो वह एशिया के मौसम को प्रभावित करती है और भारतीय उपमहाद्वीप में बरसात की मात्रा घटा देती है। वर्तमान में एल नीनो का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा है और यह संभव है कि मई के मध्य तक भारत में अपेक्षित बरसात में कमी आ जाए। इस कारण से विशेषज्ञ आशंकित हैं कि फसल पर असर पड़ सकता है और जल अभाव की स्थिति फिर से उत्पन्न हो सकती है। इमीडी ने कहा है कि दक्षिण-पश्चिमी मानसोन का शुरुआती प्रवेश वायुमंडल में मौजूद आँसुओं के रूप में नहीं, बल्कि तट से परे के आर्द्र हवाओं के रूप में महसूस किया जा रहा है। यह हवा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से लेकर अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तक विस्तृत क्षेत्र में फैल रही है। इन क्षेत्रों में रेत से लदी जलवाष्पीकरण प्रक्रिया तेज़ी से चल रही है, जिससे बादलों का निर्माण हो रहा है और बरसात के संकेत दिख रहे हैं। अधिकारियों ने किसानों को फसल संरक्षण हेतु उचित कदम उठाने की सलाह दी है, तथा जल संसाधन प्रबंधन में सतर्कता बरतने का आह्वान किया है। अंत में कहा जा सकता है कि इस वर्ष का मानसून दोधारी तलवार के समान है। एक ओर प्रारंभिक बरसात किसानों के लिए आशा की किरण लेकर आई है, तो दूसरी ओर एल नीनो की संभावना बरसात को अधूरा छोड़ सकती है। इसलिए, जल निकायों की भरपाई, जलाशयों का उचित उपयोग और फसल बीमा जैसी जाँच-परख को मजबूती से लागू करना आवश्यक है। केवल इन सावधानियों से ही भारत अपने कृषि अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकता है और मौसमी बदलावों के साथ तालमेल बिठा सकता है।