जिले-डिस्ट्रिक्ट कोर्टों से लेकर हाईकोर्ट तक, अदालतों में अब एक नया मुद्दा धधक रहा है—झूठे कानून डिग्री वाले वकीलों की भरमार। इस समस्या की जड़ को समझते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुश्री सूर्यकांत ने गंभीर शब्दों में बात की और स्पष्ट किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। उन्होंने कहा, "हजारों धोखेबाज़ वकीलों को नज़रअंदाज़ करने की बजाय, हमें सीबीआई को शामिल कर उनके डिग्री की जांच करनी चाहिए।" अधिकारीयों की इस लापरवाही से आम जनता के न्याय तक पहुँचने के अधिकार पर असर पड़ रहा है। मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि कई लोग बिना मान्य योग्यता के, फर्जी लैट फीस, अनधिकृत ऑनलाइन विज्ञापनों और सामाजिक मीडिया पर अपने आप को लाइसेंसधारी वकील बताकर क्लाइंट्स को धोखा दे रहे हैं। ऐसे फर्जी वकील न केवल न्यायपालिका की साख को घुस्थिति कर रहे हैं, बल्कि न्यायालयों में बेवजह व्यवधान और वैधानिक मामलों में गड़बड़ी भी पैदा कर रहे हैं। न्यायालय ने कई बार ऐसे मामलों को सुनने के बाद सर्वे किया कि कई बार प्रतिवादी ने वकील की वास्तविकता पर सवाल उठाया, जिससे मामले में अनावश्यक देरी और अतिरिक्त खर्चे हुए। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बीसीआई ने अब तक इस समस्या को हल करने के लिये कोई सख्त कार्रवाई नहीं की, जिससे न्यायपालिका में निराशा फैली है। उन्होंने सुझाव दिया कि सेंट्रल बैक्यूरेटरी ऑफ इन्फ़ॉर्मेशन (सीबीआई) को एक विशेष जांच टीम बनानी चाहिए, जो लायसेंसधारी वकीलों के शैक्षणिक प्रमाणपत्र, योग्यता और पृष्ठभूमि को बारीकी से जांचे। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर प्रस्तुत दस्तावेजों की सत्यापन प्रक्रिया को भी कड़ी कर, फर्जी डिग्री वाले व्यक्तियों को बार से बाहर निकालना आवश्यक है। न्यायपालिका की इस न्यूनतम कदम से न केवल आम नागरिकों को सुरक्षित न्याय मिलेगा, बल्कि कानून प्रोफ़ेशन में विश्वास का पुनर्निर्माण भी होगा। अगर सीबीआई द्वारा विस्तृत जांच के बाद फर्जी वकीलों को सख्त सजा दी जाएगी, तो भविष्य में और लोग इस क्षेत्र में छलकपट नहीं करेंगे। इसी प्रकार, साफ़-सुथरी और पारदर्शी प्रक्रिया से बार काउंसिल को भी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होगा और वह अपने सदस्यत्व प्रक्रिया में कड़ी निगरानी रखेगा। समापन में कहा जा सकता है कि न्याय के प्रति लोगों का भरोसा तभी बनाए रखा जा सकता है जब फर्जी वकीलों को हटाकर केवल योग्य और प्रमाणित पेशेवरों को ही प्रैक्टिस करने दिया जाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की इस पुकार का जवाब देना और सीबीआई को कार्रवाई में लाना, न्याय प्रणाली को सशक्त बनाने के लिये अनिवार्य कदम है। इससे न केवल न्याय के सच्चे आदर्श पुनर्स्थापित होंगे, बल्कि भविष्य में कानून के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले युवा वर्ग के लिये भी एक साफ़ और भरोसेमंद राह बनेगी।