तमिलनाडु के विधानसभा सत्र में आज एक बार फिर उधयनिदी स्टार्लिन ने अपने विवादास्पद बयान को दोहराया, जिसमें उन्होंने "सनातन धर्म को समाप्त करने" की बात कही। यह बयान मुख्यमंत्री वी.के. सकारु बेजन के निरीक्षण में हुआ, जिससे राजनीतिक माहौल और भी गर्म हो गया। स्टार्लिन ने कहा कि "सनातन धर्म हमारे समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है और इसे समाप्त करना ही समानता की दिशा में पहला कदम है"। इस टिप्पणी को सुनते ही कई सीटियां बजाने वाले दल और सामाजिक संगठनों ने इसे बहुत ही अयुक्त और निंदनीय कहा, जबकि स्टार्लिन ने अपने शब्दों को अधिकारिक तौर पर नहीं खींचा। विपक्षी दलों ने तुरंत इस बयान पर आक्रमण किया और सरकार पर सामाजिक सौहार्द को तोड़ने का आरोप लगाया। असंतुलित विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए स्टार्लिन को वोट-डंक पॉलिटिक्स का प्रयोग करने का आरोप भी लगाया गया। कई धार्मिक नेताओं ने इस बात को "धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों के खिलाफ" कहा और इस बात पर सवाल उठाया कि इस तरह के बयानों का चुनावी लाभ के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, कुछ युवा कार्यकर्ता और सामाजिक संगठनों ने स्टार्लिन के बयान का समर्थन किया, यह कहते हुए कि सामाजिक परिवर्तन के लिए कभी-कभी कठोर शब्दों की जरूरत होती है। इस विवादित बयान के बाद तमिलनाडु के गवर्नर ने अपने संबोधन में इस मुद्दे को उठाया और कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी धर्म को निशानाबंदी नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सभी धार्मिक समुदायों को सम्मानित किया जाना चाहिए और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वे विविधता को सुदृढ़ बनाएं। इस बीच, मुख्यमंत्री वी.के. सकरु ने स्टार्लिन के बयान को "उद्यमी सोच" कहा और कहा कि वह उनके विचारों का सम्मान करेंगे, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि "संवेदनशील मुद्दों पर भाषा का चयन बहुत महत्वपूर्ण है"। सांसदों के बीच इस बयान पर बहस जारी है, और इसका असर आगामी चुनावों में भी देखना बाकी है। इस घटना ने यह स्पष्ट किया है कि धार्मिक मुद्दे अभी भी भारतीय राजनीति में एक संवेदनशील बिंदु हैं, और किसी भी विरोधी विचार को कई विभिन्न दृष्टिकोणों से देखा जाता है। अंत में, यह कहा जा सकता है कि इस विवाद का समाधान संवाद और समझौते के माध्यम से ही संभव होगा, जिससे सभी वर्गों की आवाज़ सुनी जा सके और सामाजिक सद्भाव बना रहे।