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Breaking News: तमिलनाडु विधानसभा में उद्धयनिधि स्टालिन ने फिर उठाई सनातन धर्म समाप्ति की बात, जनता में उभरा विवाद
🕒 57 minutes ago

तमिलनाडु की विधानसभा में राजनीतिक महत्त्व के साथ एक और विवाद छिड़ गया है। राज्य के युवा और शिक्षित नेता उद्धयनिधि स्टालिन ने पुनः सनातन धर्म को समाप्त करने की मांग को दोहराया, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों में तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई। इस बयान को उन्होंने एक कानून पारित करने की आवश्यकता के रूप में पेश किया, जिसमें वह मानते हैं कि सनातन धर्म के कारण सामाजिक असमानताएं और धार्मिक विविधता का दमन होता है। स्टालिन के इस बयान को कई राजनीतिक दलों, धार्मिक संगठनों और सामाजिक व्याख्या विशेषज्ञों ने घोर निंदा की है, जबकि कुछ समूहों ने इसे सामाजिक सुधार की दिशा में एक साहसिक कदम के रूप में सराहा है। विधायिक सत्र के दौरान स्टालिन ने स्पष्ट रूप से कहा, "सनातन धर्म को समाप्त किया जाना चाहिए, क्योंकि यह हमारी सांस्कृतिक विविधता को नुकसान पहुंचाता है और सामाजिक जड़ता को मजबूती देता है।" उन्होंने कहा कि इस धर्म की पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और जाति व्यवस्था वर्तमान भारत में प्रचलित लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ टकराती है। इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने तुरंत प्रश्न उठाए और विधानसभा में कई आधी रात तक बहस चलती रही। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और बीजेपी ने स्टालिन पर राजनीतिक हमला किया, उन्हें वोट बैंक राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह बयान उनके चुनावी लाभ के लिए तैयार किया गया है। इस विवाद पर सामाजिक संगठनों ने भी आपत्ति जताई। कई प्रमुख धार्मिक संस्थानों ने कहा कि सनातन धर्म को समाप्त करने का विचार भारत की धार्मिक सहनशीलता और आपसी सम्मान के मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन या निर् दुर्भावनापूर्ण बयान से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और जनता के बीच ध्रुवीकरण हो सकता है। कई विशेषज्ञों ने कहा कि किसी भी समुदाय या धर्म को समाप्त करने की बात न केवल असंवैधानिक है, बल्कि सामाजिक एकता और राष्ट्रीय एकजुटता के लिए भी हानिकारक है। उन्होंने आलोचना की कि ऐसी रैडिकल बातें वास्तविक समस्याओं के समाधान की बजाय भावनात्मक उकसावे पर आधारित हैं। अंत में कहा जा सकता है कि उद्धयनिधि स्टालिन के इस बयान ने तमिलनाडु राजनीति में नई लहर खड़ी कर दी है। जबकि कुछ वर्ग इसे सामाजिक प्रगति के लिए आवश्यक कदम मानते हैं, बहुसंख्यक जनता और धार्मिक संगठनों ने इसे अनावश्यक और उकसाने वाला बताया है। इस प्रकार का विवाद न केवल राज्य की राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि देश भर में धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सामंजस्य के सवालों को भी फिर से उठाएगा। भविष्य में क्या यह विवाद सुलझेगा या और भी गहरा हो जाएगा, यह समय ही बताएगा।

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✍️ By Pradeep Yadav | 12 May 2026