जैसे ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोने की कीमतों पर अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया और तेल की कीमतों में अचानक हुई उछाल ने बाजार में टैरिफ के बारे में चिंता बढ़ा दी, देश के ज्वेलरी स्टॉक्स में तेज गिरावट देखी गई। यह समाचार कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा रिपोर्ट किया गया है। मोदी ने सोने को निवेश के रूप में बढ़ावा देने के साथ ही महंगी आयातित सोने पर टैरिफ बढ़ाने की संभावना जताई, जिससे घरेलू ज्वेलरी उद्योग के लिए अतिरिक्त दबाव बना। वहीं, रॉ तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट ने ऊर्जा सेक्टर में अस्थिरता पैदा की, जिससे सरकार को आयातित तेल पर संभावित उच्च शुल्क के बारे में सोचने पर मजबूर किया गया। इन दो प्रमुख बातों ने बाजार में असहज माहौल तैयार किया। आयातित तेल पर टैरिफ बढ़ने की संभावना से इंडियन कंपनियों की लागत में इजाफा होने की आशंका है, जबकि सोने पर टैरिफ बढ़ने से ज्वेलरी उद्योग को सीधे असर पड़ेगा। कई प्रमुख ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में 3-5 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों को हिचकिचाहट हुई। यह गिरावट न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दिखी, जहां भारतीय सोने की मांग और निर्यात दोनों पर असर पड़ता दिख रहा है। इस बीच, भारतीय ज्वेलर पर संघ ने सरकार से अपील की है कि सोने की मांग कम करने के बजाय बंकि idle सोने को मोबिलाइज़ किया जाए, जिससे बाजार में आपूर्ति को स्थिर किया जा सके। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इन दो कारकों – सोने की कीमतों में परिवर्तन और तेल की कीमतों में उछाल – के बीच का संबंध जटिल है। यदि सरकार टैरिफ बढ़ाती है तो आयात की लागत बढ़ेगी, जिससे अंत में उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी। इससे घरेलू खरीदारी में गिरावट आ सकती है, विशेषकर ज्वेलरी जैसी लक्ज़री वस्तुओं में। दूसरी ओर, यदि सरकार तेल पर टैरिफ को नियंत्रित रखती है, तो ऊर्जा लागत स्थिर रहने के कारण आर्थिक दिशा में संतुलन बना रहेगा। इस परिप्रेक्ष्य में, मोदी की रणनीति स्पष्ट है: देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना, आयात पर निर्भरता घटाना और स्थानीय उत्पादन को सशक्त बनाना। अंत में, यह स्पष्ट है कि सोने और तेल दोनों की कीमतों में हुए उतार-चढ़ाव ने भारतीय बाजार को दोहरी चुनौतियों का सामना कराया है। ज्वेलरी स्टॉक्स की गिरावट इस बात का संकेत है कि निवेशकों को अब अधिक सतर्क रहने की जरूरत है और नीतियों की दिशा में भी स्पष्टता की आवश्यकता है। यदि सरकार टैरिफ को संतुलित रखती है और सोने के उपयोग को प्रोत्साहन देती है, तो बाजार को स्थिर करने की संभावना बनी रहेगी। अन्यथा, टैरिफ की बढ़ती असुरक्षा और विदेशी आयात पर निर्भरता आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है। इस संदर्भ में आगामी नीति निर्णयों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।