वास्तव में जब तमिलनाडु की राजनीति की बात आती है तो एआईएडीएमके (अडैवीक) का नाम अनिवार्य रूप से सामने आता है। लेकिन इस बार इस पार्टी के भीतर एक गहरी विभाजन की लहर चल रही है, जिसका प्रमुख मुद्दा है विधान सभा के नेता पद (लीडर ऑफ लीजिस्लेटर पार्टी) को लेकर लगातार संघर्ष। सबसे पहले कहा जाए तो इस विवाद की जड़ में कई अनुभवी कड़ी के सांसद और विधायक हैं, जिनमें प्रमुख चेहरों में म. वी. कुलीश्मा, एस. विसाल और साल्मन बहरुश शामिल हैं। पार्टी के भीतर इन बड़े नेता-धुरंधरों के बीच शक्ति संतुलन का सवाल उठता है, और यह फटकार टोकना कई मण्डलों में परिलक्षित हो रहा है। पिछले कुछ हफ्तों में एआईएडीएमके के दो प्रमुख समूहों में स्पष्ट विभाजन उभर कर आया। एक समूह प्रमुख नेता ई.पी. सदानंदन (ईपीएस) के समर्थन में है, जो अब तक पार्टी के अध्यक्ष पद पर नहीं आ सके लेकिन अपने राजनीतिक अनुभव व जनसंपर्क से मजबूत समर्थन जुटा चुके हैं। दूसरी ओर, एस. विसाल और उनके सहयोगी बहुचर्चित विधायक एमआर. बह्ली और ए.मेहत्री जैसे नेताओं ने नई लहर को समर्थन देकर एआईएडीएमके के भीतर सत्ता के पुनर्संतुलन की मांग की है। इस बीच, कई विधायक अपने मतभेदों के कारण एआईएडीएमके के भीतर एक नई गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे दल के भीतर असहज माहौल बन रहा है। एआईएडीएमके के इस भीतर फेरबदल का सबसे बड़ा असर विधानसभा में उनके कार्यकाल के दौरान दिखाई देगा। यदि यह विभाजन जारी रहता है और कोई स्पष्ट समाधान नहीं मिलता, तो पार्टी का प्रमुख दर्जा कमजोर हो सकता है और विधानसभा में उनके पास प्रमुख रणनीतिक पदों पर कब्जा करना कठिन हो सकता है। इस बीच, कई राजनैतिक विश्लेषकों ने कहा है कि इस प्रकार का प्रत्यक्ष स्वरुपदार्थ राजनीतिक अनिश्चितता को बढ़ा रहा है, जिससे तमिलनाडु के वेतनभोगी जनता को भी सामाजिक व आर्थिक मुद्दों पर अस्वीकृति महसूस हो सकती है। इस फटकार के समाधान के लिए कई प्रयास जारी हैं। एआईएडीएमके के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कहा है कि पार्टी के भीतर चर्चा और समझौते से ही समस्या का हल संभव है। उन्होंने सुगम संवाद की दिशा में सभी दल प्रमुखों को आमंत्रित किया है, ताकि अनुशासन और एकजुटता बनाए रखी जा सके। परन्तु, विरोधी पक्ष के नेता अभी भी पार्टी के मुख्य कार्यकारियों के निर्णयों को चुनौती दे रहे हैं, और इस प्रकार के अटूट सहमति निर्माण में देर हो रही है। निष्कर्षतः, एआईएडीएमके के भीतर इस नेतृत्व संघर्ष का परिणाम तमिलनाडु की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। यदि यह फटकार जल्द ही सुलझ नहीं पाती, तो विधानसभा में उनके दल की प्रभावशीलता में गिरावट आ सकती है, और राजनीति में नई धारा उभरेगी। यह देखना बाकी है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता किस दिशा में कदम बढ़ाते हैं, और क्या एकत्रित मतभेदों के समाधान में सभी पक्ष एकजुट हो पाएँगे या फिर यह पार्टी को नई चुनौती तथा विभाजन के मोड़ पर ले जाएगा।