रूस ने इस वर्ष अपने ऐतिहासिक विजय दिवस का जश्न कमरौंद रूप में मनाया, जिससे दुनियाभर में आश्चर्य और चर्चा का माहौल बन गया। सामान्यतः 9 मई को आयोजित बड़े पैमाने के परेड की बजाय, मॉस्को की सैन्य शोभा को दंडित किया गया, जिसमें मुख्य तौर पर टैंकों और पेरिसी की जगह सीमित पंक्तियों और ड्रोन शो को प्राथमिकता दी गई। इस बदलाव के पीछे आर्थिक प्रतिबंधों का बोझ और घरेलू असंतोष को कम करने का इरादा दिखता है। परेड में अधिकांश सेना के प्रमुख इकट्ठे हुए, लेकिन वास्तविक युद्धवर्गीय बलों की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही, जिससे दर्शकों को दिखावे की बजाय गहरी पीड़ा का अहसास हुआ। परिस्थितियों को समझते हुए, राष्ट्रपति पुतिन ने इस अवसर पर नाटो के विरुद्ध कठोर रुख अपनाते हुए कई कठोर बयान भी दिए। उन्होंने नाटो को "दुश्मन" का ख़िताब दिया और कहा कि रूस की सुरक्षा को समझने वाले ही इस परेड को सच्ची विजय मानेंगे। इस बयान ने कई पश्चिमी देशों को नाराज़ किया, जबकि कुछ तुर्की, इरान और चीन जैसे मित्र राष्ट्रों ने रूस के अधिकार की ओर इशारा किया। इस बीच, यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर यह घोषणा की कि वे मॉस्को को विजय दिवस परेड आयोजित करने के लिए आधिकारिक अनुमति देते हैं, जिससे यह विवाद और बढ़ गया। रूस में इस परेड की विस्तृत तैयारी में नई तकनीकी को शामिल किया गया, जिसमें लघु-उड़ान वाले ड्रोन और हाई-डिफिनिशन स्क्रीन पर युद्ध के दृश्य प्रस्तुत किए गए। परेड की मुख्य आकर्षण में 2022 में उपयोग किए गए नयी प्रकार के टैंक की झलक भी देखी गई, लेकिन उन्हें सीमित दूरी तक ही दिखाया गया। साथ ही, कई हजार नागरिकों को इंटरनेट से बाहर कर दिया गया, जिससे ऑनलाइन चर्चा को नियंत्रित किया जा सके। इस कदम को लोकप्रियता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर वार करने वाला माना गया, लेकिन सरकार का कहना है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया। परिणामस्वरूप, इस वर्ष का विजय दिवस परेड न केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और घरेलू नीतियों का प्रतिबिंब बन गया। आर्थिक प्रतिबंधों के कारण संसाधन सीमित रहने के कारण रूस ने परेड को छोटा और नियंत्रित करने का निर्णय लिया, जबकि पुतिन ने इसे राष्ट्रीय भावना को सुदृढ़ करने का अवसर बनाया। विश्व समुदाय में इस परेड को लेकर मतभेद स्पष्ट दिख रहे हैं; कुछ इसे रूसी शक्ति की नई अभिव्यक्ति मानते हैं, तो कुछ इसे निराशा और दबाव का प्रतीक देखते हैं। अंततः, मॉस्को में घटाए गए इस विजय दिवस परेड ने यह सिद्ध किया कि परंपरागत समारोह भी बदलती भू-राजनीतिक परिस्थिति और घरेलू चुनौतियों के साथ ढलते हैं। यदि भविष्य में भी आर्थिक और राजनीतिक दबाव बना रहता है, तो इस प्रकार के छोटे परेड और डिजिटल शोभा संभवतः नियमित हो सकते हैं। यह स्थिति न केवल रूस के सैन्य अभिव्यक्ति को बल्कि विश्व के शतरंज के मोहरे को भी पुनः परिभाषित करती है, जहाँ हर कदम का असर अनिवार्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पड़ता है।