तमिलनाडु की राजनीति आज एक नई उलझन में फंसी हुई है। एमएमके के नेता टीटीवी धिनाकरण ने राज्य गवर्नर से मुलाकात की और एआईएडीएमके सरकार के गठन के लिए न्यौता माँगा। यह कदम तब आया जब कांग्रेस और डीएमके के गठबंधन ने अपनी सत्ता सत्ता की घोषणा कर ली थी, जबकि एआईएडब्ल्यूएमके के पास अभी भी आवश्यक मतों की संख्या बना हुआ थी। धिनाकरण ने कहा कि उनकी पार्टी ने कई एआईएडीएमके विधायक को समर्थन दिया है और यदि गवर्नर उन्हें आमंत्रित कर दें तो राजनीतिक स्थिरता बनी रहेगी। इस अपील में उन्होंने यह भी उजागर किया कि कुछ विधायक अभी भी लापता हैं और उनकी अनुपस्थिति का पता लगाना आवश्यक है। धिनाकरण के बयानों के बाद विभिन्न दलों के नेताओं ने इस मुद्दे पर अपने-अपने मत प्रकट किए। एआईएडीएमके के मुख्य सिंह के पार्टी प्रमुख ने कहा कि वे संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत किसी भी पार्टी को समर्थन दे सकते हैं, परंतु अंतिम निर्णय गवर्नर का ही होगा। वहीं, कांग्रेस ने साहसपूर्वक कहा कि उनका गठबंधन स्थायी है और उनके पास आवश्यक बहुमत है, इसलिए उन्हें कोई न्यौता नहीं देना चाहिए। इस बीच, कुछ एआईएडीएमके विधायक ने खुद को रिपोर्ट किया कि वे धिनाकरण की पार्टी के साथ नहीं हैं और उन्होंने इस बयान को झूठा ठहराया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धिनाकरण की इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य एआईएडीएमके को बाधित करना और अपने समूह के लिए राजनीतिक लाभ प्राप्त करना है। यदि गवर्नर एआईएडीएमके को न्यौता देते हैं, तो धिनाकरण का समर्थन एआईएडीएमके को एक अतिरिक्त सुरक्षा जाल प्रदान कर सकता है और गठबंधन को कमजोर बना सकता है। दूसरी ओर, यदि गवर्नर कांग्रेस-डीएमके गठबंधन को न्यौता देते हैं, तो धिनाकरण को अपने कदम का फल नहीं मिलेगा और वह निराश हो सकता है। यह स्थिति तमिलनाडु की राजनीति को और जटिल बना रही है। अंत में यह कहा जा सकता है कि तमिलनाडु में सरकारी गठन का सवाल अभी भी अनसुलझा है। धिनाकरण की अपील ने इस दांव को और रोमांचक बना दिया है, जबकि सभी पक्षों को अब गवर्नर के निर्णय का इंतजार करना होगा। यदि गवर्नर किसी भी पक्ष को न्यौता देते हैं, तो वह राज्य की राजनीतिक स्थिरता और विकास के लिए एक नई दिशा तय करेगा। इस दौरान जनता को भी यह देखना पड़ेगा कि कौन-से कदम से उनके क्षेत्र में स्थिरता और प्रगति आती है।